पदोन्नति का महादेव, न्याय का सट्टा और सिस्टम का “छप्परफाड़” खेल

बात बेबाक
चंद्रशेखर शर्मा (पत्रकार)
(छत्तीसगढ़ उजाला)-छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के दौरान विपक्ष द्वारा कांग्रेसियों और उनके चापलूस अफसरों को लेकर जिस तरह “महादेव–महादेव” की माला जपी जाती थी, वह तब तक रहस्य बनी रही जब तक इसके असली मायने समझ में नहीं आए। पहले लगा कि शायद भोले बाबा की भक्ति का राजनीतिक संस्करण है, लेकिन एक दिन गोबरहीन टुरी में एक साधारण-सी बात ने पूरी तस्वीर साफ कर दी—“मोर लपरहा टुरा महादेव सट्टा ऐप में सट्टा लगाथे…”
बस, वहीं दिमाग की बत्ती जल गई। समझ आया कि कांग्रेस–भाजपा के बीच जिस महादेव की चर्चा हो रही थी, वह भोलेनाथ नहीं, बल्कि सट्टा वाले महादेव हैं।
महादेव सट्टा ऐप की आंच अब पूर्व मुख्यमंत्री तक पहुंच चुकी है। तत्कालीन खद्दर और खाकी के गठजोड़ की कहानी आज सीबीआई की टेबल पर “जांच दर जांच” में उलझी पड़ी है। कबीरधाम में पदस्थ रहे रील मास्टर एसपी से भी सीबीआई पूछताछ कर चुकी है। और अब एक बार फिर महादेव सट्टा ऐप का नाम पुलिस विभाग की पदोन्नति प्रक्रिया में गूंज रहा है।
जब पुलिस में कानून नहीं, “पदोन्नति-व्यवस्था” चरमराए
छत्तीसगढ़ पुलिस महकमे में इन दिनों चिंता का विषय कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि पदोन्नति-व्यवस्था है। फरियादी कोई आम सिपाही नहीं, बल्कि खुद कबीरधाम के पुलिस अधीक्षक—2012 बैच के आईपीएस धर्मेंद्र सिंह छवई हैं।
जब रक्षक ही न्याय की गुहार लेकर मुख्यमंत्री के दरबार पहुंचे, तो समझ लीजिए कि सिस्टम का थाना खुद लॉकअप बन चुका है।कहते हैं न्याय अंधा होता है, लेकिन छवई का पत्र बताता है कि पुलिस मुख्यालय में बैठा न्याय सिर्फ अंधा नहीं, बल्कि चयनात्मक दृष्टिदोष से ग्रसित है।
कुछ अफसरों के खिलाफ एफआईआर, सीबीआई जांच और महादेव सट्टा ऐप जैसे गंभीर आरोप उसे दिखाई नहीं देते, लेकिन किसी एक अफसर पर विवेचना स्तर की जांच उसे आंखों में चुभती लाल मिर्च की तरह लगती है।
सीएम को लिखा पत्र: चिट्ठी नहीं, सिस्टम पर पत्थर
एसपी धर्मेंद्र सिंह छवई द्वारा मुख्यमंत्री को लिखा गया पत्र कोई भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि सत्ता के शीशमहल में फेंका गया सिस्टम पर पत्थर है।
यह पत्र विभागीय गुटबाजी, अंदरखाने की राजनीति और चेहरे देखकर नियमों की व्याख्या की पोल खोलता है।
यह वह क्षण है जब कुर्सियों पर बैठे लोगों को आत्ममंथन करना चाहिए—
अगर आज एक एसपी न्याय मांग रहा है, तो कल सिपाही किस दरवाजे पर जाएगा?
और आम जनता अपनी फरियाद किसे लिखेगी?
महादेव सट्टा ऐप: अब कांड नहीं, “योग्यता प्रमाण पत्र”
पत्र में महादेव सट्टा ऐप का जिक्र साफ संकेत देता है कि यह अब सिर्फ एक घोटाला नहीं, बल्कि कुछ अफसरों के लिए पदोन्नति का योग्यता प्रमाण पत्र बन चुका है।
जिस अफसर का नाम एफआईआर में हो, जिसकी फाइल सीबीआई की मेज पर हो—वही डीआईजी बनने की दौड़ में आगे दिखाई देता है।
यह वही पुराना राजनीतिक खेल है—“दाग बड़े हों तो ऊपर तक पहुंच होती है,और दाग छोटे हों तो कुचल दिए जाते हैं।”
छाया में ठंडक, धूप में झुलसना
महादेव सट्टा ऐप की काली छाया पूरे विभाग पर है, लेकिन अजीब संयोग देखिए—
कुछ लोग इसी छाया में ठंडक महसूस कर रहे हैं,और कुछ लोग उसी में झुलस रहे हैं।आरोपी विदेश में ऐश कर रहे हैं,
महादेव ऐप के नए-नए वर्जन लॉन्च हो रहे हैं,और जांच कछुआ चाल से रेंग रही है।सरकारों की चुप्पी या तो सब कुछ जानने की स्वीकारोक्ति है,या फिर जानकर भी अनजान बने रहने की मजबूरी।एसपी का यह पत्र व्यंग्य नहीं, बल्कि चेतावनी है—
अगर पदोन्नति योग्यता और न्याय से नहीं, बल्कि राजनीतिक उपयोगिता से तय होगी,तो पुलिस वर्दी का रंग खाकी नहीं, धूसर हो जाएगा।आज सवाल एक अफसर ने उठाया है,
कल सवाल पूरा सिस्टम कटघरे में खड़ा करेगा।
तब जनता सिर्फ यही पूछेगी—
“साहब, छत्तीसगढ़ में कानून चलता है
या फिर सट्टा, सत्ता और सेटिंग?”
चलते-चलते…
क्या शिक्षा विभाग में मेडिकल अवकाश घोटालेबाजों पर एफआईआर दर्ज होगी और वसूली होगी,
या फिर मामला हमेशा की तरह टांय–टांय फिस्स हो जाएगा?
और अंत में—
जो तौर तरीका है दुनिया का, उसी तौर तरीके से बोलो,
बहरों का इलाक़ा है, ज़रा ज़ोर से बोलो।




