कूट रचना से नौकरी का आरोप, व्याख्याता श्रीनिवास पाण्डेय ने शिक्षा व्यवस्था को बनाया मज़ाक?

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही(छत्तीसगढ़ उजाला)
जिले की शिक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर बड़ा सवालिया निशान लग गया है। विकासखंड गौरेला के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जोगीसार में पदस्थ व्याख्याता श्रीनिवास पाण्डेय पर शैक्षणिक प्रमाण पत्रों में कथित कूट रचना कर सरकारी नौकरी हासिल करने का गंभीर आरोप सामने आया है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला सिर्फ नौकरी पाने का नहीं, बल्कि सिस्टम से खुला धोखा, शासकीय धन की लूट और भरोसे की हत्या है।
जिस व्यक्ति को बच्चों के भविष्य को गढ़ने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी, वही अगर फर्जी दस्तावेजों के सहारे वर्षों तक शासन को गुमराह करता रहा, तो सवाल सिर्फ शिक्षक पर नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र पर खड़ा होता है।
प्रमाण पत्रों का सत्यापन या सिर्फ दिखावा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि नियुक्ति के समय शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की जांच आखिर कैसे हुई?क्या सत्यापन सिर्फ कागज़ी औपचारिकता था, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?
यदि दस्तावेज संदिग्ध थे, तो नियुक्ति किस आधार पर हुई और वर्षों तक वेतन कैसे जारी रहा?
सरकारी खजाने पर सीधा डाका
सूत्रों की मानें तो संदिग्ध प्रमाण पत्रों के आधार पर न केवल नौकरी हासिल की गई, बल्कि सालों तक सरकारी खजाने से लाखों रुपये का वेतन भी निकाला गया। यह सीधे तौर पर शासकीय धन की हेराफेरी और आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है।
इतने साल चुप्पी क्यों?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह मामला इतने वर्षों तक दबा कैसे रहा?क्या यह महज़ लापरवाही थी, या फिर विभागीय संरक्षण का नतीजा? अधिकारी इस पूरे मामले से वाकिफ थे, तो उनकी भूमिका भी संदेह के घेरे में है।
अब वक्त सवाल पूछने का नहीं, जवाबदेही तय करने का है।
पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो
नियुक्ति से जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं
आरोप सिद्ध होने पर तत्काल बर्खास्तगी, वेतन की रिकवरी और आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए
यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि शिक्षा में फैले फर्जीवाड़े और सिस्टम के भीतर बैठे संरक्षण तंत्र के खिलाफ है।
अगर अब भी शासन और प्रशासन चुप रहा, तो यह चुप्पी साजिश की साझेदार मानी जाएगी।




