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छत्तीसगढ़ में ‘डीएमएफ फंड’ पर बड़ा सवाल: जिलों में दबे हैं 2681 करोड़, 10 जिलों में ऑडिट तक नहीं… कोरबा घोटाले की आंच पहुंची PMO तक

रायपुर छत्तीसगढ़ उजाला।

खनिज संपदा से भरपूर छत्तीसगढ़ में जिला खनिज न्यास (DMF) फंड की चर्चा गाहे बगाहे आ ही जाती है।खनिज न्यास एक बार फिर बड़े विवाद और कई सवालों के केंद्र में है। खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए बनाया गया यह फंड अब पारदर्शिता, ऑडिट और कथित घोटालों को लेकर चर्चा में है।डीएमएफ का अगर एक हिसाब लगाया जाए तो बहुत बड़ी कहानी सामने आएगी। आज तक मे डीएमएफ के अरबो रुपये जिला प्रशासन ने फूंके पर आज भी इन क्षेत्रों में विकास लुप्त ही है।आखिर इतने पैसे व्यय करने के बाद भी आज भी इन क्षेत्रों की समस्याएं क्यो दूर नही हो पाई।


प्रदेश में हजारों करोड़ रुपए डीएमएफ मद में जमा हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर विकास कार्यों की रफ्तार बेहद धीमी है। कई जिलों में पैसा वर्षों से खातों में पड़ा हुआ है, जबकि खनन प्रभावित गांव आज भी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब फंड उपलब्ध है तो विकास आखिर दिख क्यों नहीं रहा?

छत्तीसगढ़ उजाला की पड़ताल में सामने आया है कि छत्तीसगढ़ के कई जिलों में करीब 2681 करोड़ रुपए डीएमएफ फंड के रूप में जमा हैं। बताया जा रहा है कि कई जगह योजनाएं स्वीकृत होने के बावजूद काम शुरू नहीं हो पा रहा, जबकि कुछ मामलों में फंड जारी होने के बाद भी परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं।यह फंड आखिर किस लिए खर्च नही किये गए है इसकी जांच भी होनी चाहिए।


सूत्रों का दावा है कि कुछ जिलों में अधिकारी जानबूझकर राशि रोककर बैठे हैं। यही स्थिति संभावित वित्तीय गड़बड़ियों और फंड हेरफेर की आशंका को जन्म दे रही है।
डीएमएफ फंड को लेकर सबसे चिंताजनक तथ्य यह सामने आया है कि प्रदेश के 10 जिलों में ऑडिट ही पूरा नहीं हुआ है।यानी यह स्पष्ट नहीं है कि फंड का कितना पैसा कहां खर्च हुआ और कितना अब भी लंबित है। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि ऑडिट न होना किसी भी फंड में अनियमितताओं की सबसे बड़ी वजह बनता है, क्योंकि इससे जवाबदेही तय नहीं हो पाती।

सूत्रों के मुताबिक कुछ जिलों में दो साल से ऑडिट लंबित है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में स्थिति को “प्रगतिरत” बताया जा रहा है।कोरबा जिले में सामने आए कथित डीएमएफ घोटाले ने पूरे प्रदेश में हलचल मचा दी है। शुरुआती तौर पर लगभग 350 करोड़ रुपए की अनियमितता की चर्चा थी, लेकिन अब यह आंकड़ा बढ़कर करीब 500 करोड़ रुपए तक पहुंचने की बात कही जा रही है।मामले की जांच का दायरा अब 10 जिलों तक फैल चुका है। शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक पहुंचने के बाद मामले ने और तूल पकड़ लिया है।


बताया जा रहा है कि इस मामले में ईओडब्ल्यू (EOW) के साथ-साथ ईडी (ED) की भी एंट्री हो चुकी है। ऐसे में यह सवाल और गंभीर हो गया है कि अगर एक जिले में इतनी बड़ी गड़बड़ी सामने आई है तो बाकी जिलों की स्थिति कितनी पारदर्शी है?डीएमएफ यानी जिला खनिज न्यास फंड खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए बनाया गया विशेष फंड है।इस राशि का उपयोग मुख्य रूप से इन कार्यों में किया जाना चाहिए:


स्वास्थ्य सुविधाएं
शिक्षा
पेयजल व्यवस्था
सड़क निर्माण
रोजगार और आजीविका
खनन प्रभावित गांवों का पुनर्विकास


भारत सरकार के नियमों के मुताबिक जिस जिले से खनिज निकाला जाता है, उसी जिले में यह राशि खर्च की जानी चाहिए। लेकिन कई मामलों में आरोप लगे हैं कि फंड का उपयोग नियमों के विपरीत किया गया या फिर राशि को वर्षों तक बिना उपयोग के रोककर रखा गया।

जमीनी हकीकत: पैसा है पर विकास लापता …..
खनन प्रभावित इलाकों में आज भी कई गांव मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। कहीं अस्पताल अधूरे हैं, कहीं स्कूलों में संसाधनों की कमी है तो कहीं पेयजल और सड़क जैसी सुविधाएं अब भी सपना बनी हुई हैं।ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब हजारों करोड़ रुपए उपलब्ध हैं तो आखिर विकास धरातल पर क्यों नहीं दिख रहा?विकास किसका हो रहा है यह भी जांच का विषय है।कही इस फंड से बड़ी राशि ब्याज के रूप में खाने का खेला तो नही किया जा रहा है।


छत्तीसगढ़ में डीएमएफ फंड अब सिर्फ विकास का माध्यम नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन चुका है।यदि समय रहते ऑडिट, निगरानी और सार्वजनिक जवाबदेही की मजबूत व्यवस्था नहीं बनाई गई तो विकास के लिए बना यह फंड भी भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की भेंट चढ़ सकता है।

*बहुत जल्द कोरबा डीएमएफ की एक आईएएस की कहानी आपके सामने आएगी।

प्रशांत गौतम

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