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“सोशल मीडिया की चमक के पीछे काला खेल: मुंबई से दुबई तक फैला बाबू खेमानी का सट्टा साम्राज्य,

लग्जरी लाइफस्टाइल की आड़ में अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क, हवाला-मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल पर जांच तेज; भगोड़े ललित मोदी से कनेक्शन की पड़ताल

रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-सोशल मीडिया पर लग्जरी गाड़ियां, प्राइवेट जेट्स और दुबई के आलीशान होटलों में छुट्टियां दिखाने वाला बाबू खेमानी अब जांच एजेंसियों के निशाने पर है। जिसे लोग एक सफल डिजिटल इन्फ्लुएंसर समझ रहे थे, वह दरअसल एक अंतरराष्ट्रीय सट्टेबाजी नेटवर्क का अहम चेहरा निकला। रायपुर पुलिस की हालिया जांच में इस पूरे सिंडिकेट के ‘थ्री-लेयर’ ऑपरेशन का खुलासा हुआ है, जिसके तार देश से बाहर तक फैले बताए जा रहे हैं।

इस मामले का सबसे सनसनीखेज पहलू इसका अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, खेमानी की दुबई यात्राएं केवल घूमने-फिरने तक सीमित नहीं थीं। जांच में सामने आया है कि वहां उसकी मुलाकातें भारत के चर्चित भगोड़े कारोबारी ललित मोदी से हुईं।
एजेंसियां इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि क्या इन मुलाकातों के जरिए सट्टेबाजी नेटवर्क को वैश्विक स्तर पर विस्तार देने की रणनीति तैयार की गई थी। साथ ही यह भी जांच का विषय है कि सट्टे से कमाया गया पैसा हवाला और मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए विदेशों तक कैसे पहुंचाया जा रहा था।

पिछले पांच वर्षों में खेमानी की जीवनशैली में आए अचानक बदलाव ने लोगों को प्रभावित किया, लेकिन संदेह नहीं हुआ।
सोशल मीडिया पर खुद को ‘यंग सक्सेस आइकन’ के रूप में पेश करना दरअसल एक सुनियोजित रणनीति थी। लग्जरी लाइफस्टाइल ने उसे एक ऐसी पहचान दी, जिसने उसके अवैध कारोबार को छिपाने का काम किया।
रील लाइफ की चमक ने रियल लाइफ के काले धंधों को लंबे समय तक पर्दे के पीछे बनाए रखा।

इस नेटवर्क का सबसे चिंताजनक पहलू युवाओं का बड़े पैमाने पर शोषण है।
क्विक मनी का लालच: ‘रातों-रात अमीर बनने’ के सपने दिखाकर युवाओं को जोड़ा गया।
फंसाने की रणनीति: पहले छोटे मुनाफे का झांसा, फिर व्हाट्सएप ग्रुप्स के जरिए बड़े दांव।
अंतिम जाल: कर्ज, नुकसान और अपराध के चक्र में फंसा देना।
बताया जा रहा है कि 2023 तक इस नेटवर्क से करीब 55 हजार लोग जुड़ चुके थे, जिनमें बड़ी संख्या छात्रों और बेरोजगार युवाओं की थी।

जांच में यह भी सामने आया है कि इस नेटवर्क के जरिए करोड़ों रुपये का अवैध लेनदेन किया गया। हवाला चैनलों के माध्यम से पैसे को देश से बाहर भेजा जाता था।
अब एजेंसियां बैंक ट्रांजेक्शन, डिजिटल डेटा और विदेशी कनेक्शन खंगाल रही हैं, ताकि पूरे नेटवर्क की जड़ तक पहुंचा जा सके।

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति या गिरोह तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में उभर रहे एक बड़े खतरे की ओर इशारा करता है।
‘इन्फ्लुएंसर’ की आड़ में अपराध को छिपाने का यह मॉडल तेजी से फैल रहा है, जहां दिखावटी सफलता के जरिए लोगों का भरोसा जीतकर उन्हें अवैध गतिविधियों में धकेला जा रहा है।
फिलहाल पुलिस की जांच जारी है, लेकिन इतना साफ है कि बाबू खेमानी का नेटवर्क महज एक हिस्सा हो सकता है—जिसके तार देश की सीमाओं से बाहर तक फैले हुए हैं।

प्रशांत गौतम

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