*इस प्रदेश का बदला नाम: वामपंथी सरकार का प्रस्ताव केंद्र ने झट से क्यों कर लिया मंजूर, क्या है इस शब्द का मतलब*
छत्तीसगढ़ उजाला

नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम (छत्तीसगढ़ उजाला)। आमतौर पर विपक्ष की ओर से कोई प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास आता है, तो उस पर लंबी बहस होती है, कई बार फाइलें अटक जाती हैं और अक्सर उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। लेकिन जब बात दक्षिण भारत के अहम राज्य केरल की आई, तो यह धारणा पूरी तरह टूट गई। केरल की वामपंथी (LDF) सरकार ने राज्य का नाम बदलकर ‘केरल’ से ‘केरलम’ करने का प्रस्ताव भेजा था और मंगलवार को केंद्रीय कैबिनेट ने बिना किसी लंबी खींचतान के इस प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी। आखिर ऐसा क्या हुआ कि मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की कम्युनिस्ट सरकार के इस प्रस्ताव पर मोदी सरकार ने इतनी जल्दी मुहर लगा दी? ‘केरलम’ शब्द का असली मतलब क्या है?
सबसे पहले इस फैसले की टाइमिंग और जगह जान लेना जरूरी है। केरल को केरलम करने का फैसला नए पीएमओ में हुई पहली मीटिंग में लिया गया। केंद्रीय कैबिनेट ने राज्य सरकार के उस प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है, जिसमें संविधान की पहली अनुसूची और सभी आधिकारिक भाषाओं में राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने की मांग की गई थी।
वामपंथी सरकार का प्रस्ताव, केंद्र ने ‘झट से’ क्यों किया मंजूर?
सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि केंद्र सरकार ने इतनी आसानी से हामी कैसे भर दी। इसके पीछे कूटनीति, राजनीति और टाइमिंग का एक बहुत बड़ा मास्टरस्ट्रोक छिपा है।
अप्रैल-मई में होने वाले विधानसभा चुनाव
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब केरल में अप्रैल-मई के महीने में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बीजेपी पिछले कई सालों से केरल में अपना सियासी आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है। दक्षिण भारत में अपनी पैठ बनाने के लिए केरल बीजेपी के लिए एक बहुत अहम राज्य है।
सबसे बड़ा मुद्दा छीना
केरल के लोग अपनी भाषा ‘मलयालम’ और अपनी संस्कृति को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। अगर केंद्र सरकार इस प्रस्ताव को खारिज कर देती या लटकाए रखती, तो वामपंथी गठबंधन (LDF) और कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन (UDF) इसे चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बना लेते। वे जनता के बीच यह संदेश देते कि केंद्र सरकार केरल की भाषा और संस्कृति का सम्मान नहीं करती। केंद्र ने इसे तुरंत मंजूर करके विपक्ष के हाथ से यह बड़ा चुनावी मुद्दा छीन लिया है। अब बीजेपी केरल की जनता के बीच यह कह सकती है कि हम आपकी मातृभाषा और आपकी क्षेत्रीय पहचान का पूरा सम्मान करते हैं”।
सर्वसम्मति का दबाव
केरल विधानसभा ने 24 जून 2024 को यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास किया था। यानी इस प्रस्ताव पर राज्य की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी (LDF) और विपक्षी कांग्रेस (UDF) दोनों एक साथ थे। जब किसी राज्य की पूरी विधानसभा एक सुर में कोई मांग करती है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में केंद्र के लिए उसे लंबे समय तक नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाता है।
‘केरलम’ शब्द का असली मतलब क्या है?
पहली बात, मलयालम भाषा बोलने वाले लोग हमेशा से अपने राज्य को ‘केरलम’ ही कहते आए हैं। यह कोई नया नाम नहीं है, बल्कि यह इस जमीन का मूल नाम है। इस नाम के पीछे मुख्य रूप से दो थ्योरी मानी जाती हैं।




