छत्तीसगढ़ उजाला की खबर के बाद फिर घिरा मेट्रो इन बार लाइसेंस, पहले लौटी फाइल, अब नई रिपोर्ट से मंजूरी की कोशिश पर उठे सवाल
रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-राजधानी रायपुर के भाठागांव चौक स्थित होटल मेट्रो इन के एफ.एल.-2(क) (स्टार श्रेणी रेस्टोरेंट बार) लाइसेंस को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। छत्तीसगढ़ उजाला द्वारा इस मामले में दस्तावेजी आधार पर अनियमितताओं का खुलासा किए जाने के बाद आबकारी आयुक्त कार्यालय ने आवेदन की जांच में कई गंभीर कमियां पाई थीं। इन्हीं आपत्तियों के चलते बार लाइसेंस जारी नहीं किया गया और पूरी फाइल जिला आबकारी कार्यालय को वापस भेज दी गई थी।
आबकारी आयुक्त द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि आवेदन के साथ प्रस्तुत किरायानामा और अन्य दस्तावेजों में लाइसेंस के लिए आवश्यक क्षेत्रफल स्पष्ट नहीं है। एफ.एल.-2(क) अनुज्ञप्ति के लिए निर्धारित डाइनिंग एरिया, रिसेप्शन और किचन के मानकों का दस्तावेजों से सत्यापन नहीं हो पा रहा था। इसके अलावा होटल द्वारा बताए गए लगभग 50 लाख रुपये वार्षिक टर्नओवर के समर्थन में आयकर विवरणी और ऑडिट रिपोर्ट भी प्रस्तुत नहीं की गई थी। स्टोर रूम, बार रूम और स्मोकिंग जोन के फोटोग्राफ भी स्पष्ट नहीं पाए गए। इन्हीं कमियों के कारण आबकारी आयुक्त ने संशोधित प्रतिवेदन और आवश्यक दस्तावेज दोबारा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे।
अब पूरे मामले में नया मोड़ सामने आया है। जानकारी के अनुसार, जिन कमियों को पहले आबकारी आयुक्त कार्यालय ने गंभीर मानते हुए लाइसेंस जारी करने से इनकार किया था, उन्हें जिला आबकारी कार्यालय ने दूसरी रिपोर्ट में दुरुस्त बताते हुए फाइल दोबारा आबकारी आयुक्त के पास भेज दी है। यही बात अब सबसे बड़े सवालों को जन्म दे रही है। आखिर जिन खामियों के कारण पूरी फाइल वापस लौटा दी गई थी, वे इतनी कम अवधि में कैसे दूर हो गईं? क्या मौके पर वास्तविक सुधार किए गए या केवल कागजी प्रक्रिया पूरी कर दी गई? यह जांच का विषय बन गया है।
सबसे बड़ी बात यह है कि एक बार लाइसेंस जारी कराने के लिए जिला आबकारी कार्यालय जिस तेजी से सक्रिय दिखाई दे रहा है, उसने विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सामान्य मामलों में लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया देखने को मिलती है, लेकिन इस मामले में फाइल को तत्काल दोबारा तैयार कर मंजूरी के लिए भेजे जाने को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।
मंदिर के मुद्दे पर भी उठ रहे हैं सवाल
इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील पहलू यह बताया जा रहा है कि प्रस्तावित बार के आसपास मंदिर स्थित है। आरोप है कि इस महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख जिला आबकारी अधिकारियों द्वारा अपनी रिपोर्ट में नहीं किया जा रहा है। यदि धार्मिक स्थल की निकटता का तथ्य सही है, तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय बनता है। इसके बावजूद इस पहलू की अनदेखी कर लाइसेंस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिश पर भी सवाल उठ रहे हैं।
पूरे घटनाक्रम ने यह बहस भी छेड़ दी है कि क्या नियमों के पालन में सभी आवेदकों के लिए एक समान मापदंड अपनाए जाते हैं, या कुछ मामलों में विशेष तत्परता दिखाई जाती है। स्थानीय स्तर पर तरह-तरह की चर्चाएं हैं और लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रभाव, कथित लेनदेन या सेटिंग के दम पर पहले चिन्हित की गई कमियां भी आसानी से दूर मान ली जाती हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इस संबंध में संबंधित आबकारी अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
अब निगाहें आबकारी आयुक्त कार्यालय के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभाग पहले दर्ज की गई आपत्तियों और नई रिपोर्ट का परीक्षण किस आधार पर करता है तथा क्या नियमों और तथ्यों के अनुरूप ही अंतिम फैसला लिया जाएगा।




