“जब हर घोटाले का ‘अज्ञात कारण’ हो और हर फाइल ‘दुरुस्त’: तब समझिए सिस्टम बीमार नहीं, बेईमान है”

🖋️ बात बेबाक
चंद्रशेखर शर्मा (पत्रकार) | 9425522015
हमारे देश में दो चीज़ें कभी बीमार नहीं पड़तीं—एक सरकारी फाइल और दूसरी अफसरों का जमीर। फाइल चाहे कितनी भी पुरानी हो जाए, उसमें दर्ज हर तथ्य “एकदम स्वस्थ” रहता है। जंगल में तीर से घायल बायसन हो या आधा-अधूरा विकास कार्य—कागजों पर सब कुछ 100% फिट दिखता है। मानो फाइलों के लिए कोई अलग फिटनेस सेंटर हो, जहां झूठ को रिश्वत का प्रोटीन शेक पिलाकर ताकतवर बना दिया जाता है।
अफसरों का जमीर भी कम दिलचस्प नहीं। उसने खुद को “डू नॉट डिस्टर्ब” मोड पर डाल रखा है। कभी हल्की सी हलचल होती भी है तो कोई आदेश, कोई बहाना उसे फिर से सुला देता है। शायद जमीर भी सोचता होगा—“यहां जागकर फायदा ही क्या है?”
अगर इस पूरे सिस्टम को एक खेल मान लें, तो यह “जिम्मेदारी से बचो” नाम का ओलंपिक इवेंट है—जहां हर खिलाड़ी गोल्ड मेडल जीतने में जुटा है।
एक पुरानी फिल्म का डायलॉग याद आता है—
“जब तक जुल्म है, जमींदार है, डकैत खत्म नहीं हो सकते।”
आज के हालात में इसे यूं कह सकते हैं—
“जब तक लालफीताशाही जिंदा है, तब तक सुशासन सिर्फ कागजों में ही रहेगा।”
भले ही नक्सलवाद पर काबू पाने की बातें हों, लेकिन लालफीताशाही का आतंक अब भी आम जनता की सांसें थामे हुए है। हालात ऐसे हैं कि अगर कोई कलेक्टर को छत्तीसगढ़ी में आवेदन दे दे, तो उसका “ईगो” आहत हो जाता है।
कबीरधाम में अफसरों की कला भी निराली है—खाना खाते हैं, पचा जाते हैं, लेकिन पेमेंट की बारी आते ही ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। कुर्की के आदेश के बाद वही अफसर समय की भीख मांगते नजर आते हैं। लेने में समय नहीं, देने में समय चाहिए—सरकारी घड़ी भी शायद “लालफीताशाही टाइम ज़ोन” पर चलती है, जहां हर काम कल पर टलता है और वो कल कभी आता नहीं।
जंगल का घायल बायसन कागजों में “पूरी तरह स्वस्थ” था। वन विभाग की लापरवाही ने उसे मौत के मुंह में धकेल दिया, लेकिन फाइलों में वह अब भी दौड़ रहा है। यही सरकारी जादू है—सूखे में हरियाली और बर्बादी में “सब कंट्रोल में” दिखाने का।
राजनीति का रंग भी इन दिनों कुछ ज्यादा गाढ़ा है। एक दुराचार के मामले में गिरफ्तारी होती है, और सवाल उठता है—प्रेम अचानक अपराध कैसे बन गया? सच कहीं फाइलों में छुट्टी पर है, और बयानबाजी जारी है। यहां रिश्ते भी मौसम की तरह बदलते हैं—जब तक सब ठीक, तब तक सहमति; जैसे ही दरार आई, “दुराचार” का आरोप।
“नारी वंदन” के नाम पर संवेदनाओं का जो नाटक चलता है, वह किसी रुदाली के रुदन से कम नहीं। मगरमच्छ के आंसू बहाए जाते हैं, पुतले जलते हैं, लेकिन मन का पाप नहीं जलता। प्रेस कॉन्फ्रेंस होती हैं, शब्दों के बाण चलते हैं—बस न्याय कहीं दिखाई नहीं देता। नारी सम्मान अब वोट बैंक का हिस्सा बनता जा रहा है।
धान घोटाले की कहानी तो जैसे वेब सीरीज बन चुकी है—हर एपिसोड में नया ट्विस्ट। कभी चूहे खा जाते हैं, कभी दीमक, कभी मौसम, कभी “अज्ञात कारण”। लगता है धान नहीं, जिम्मेदारी गायब हो रही है। कागजों में सब “ओके”, जमीन पर सब “खोया”। अब तो “धान खोजो अभियान” चलाना पड़े—जो ढूंढे, वही मालिक!
चिल्फी आरटीओ बैरियर अब चेकपोस्ट कम, वसूली केंद्र ज्यादा लगता है। कैमरा दिखते ही सिस्टम बदल जाता है—“आइए, बैठिए, चाय लेंगे?” और कैमरा हटते ही असली खेल शुरू—फोन नंबर, सेटिंग, डील। नया आर्थिक मॉडल है—टैक्स से ज्यादा भरोसा लिफाफे पर।
जिले की सड़कें भी अब व्यंग्य करने लगी हैं—समझ नहीं आता सड़क में ब्रेकर है या ब्रेकर के बीच सड़क। हर मीटर पर झटका, हर मोड़ पर सवाल। लेकिन भ्रष्टाचार पर ब्रेकर क्यों नहीं लगता? शायद इसलिए कि उस रास्ते के ठेकेदार वही हैं जो गाड़ी चला रहे हैं।
कागजी घोड़े दौड़ाने में हमारे अफसरों की कोई बराबरी नहीं। रिपोर्ट ऐसी बनती है कि लगे देश स्वर्ग बन चुका है। लेकिन जमीन पर उतरते ही हकीकत थप्पड़ मारकर याद दिलाती है—
“यह इंडिया है, सिर्फ कागजों वाला भारत नहीं।”
सबसे दुखद यह है कि सिस्टम का शोषण करने वालों को शर्म नहीं आती। जमीर मर चुका है। आज सिस्टम “एडजस्टमेंट” पर चलता है—हर गलत को सही ठहराने की कला, हर भ्रष्टाचार को सामान्य बनाने की आदत।
जब तक यह चलता रहेगा, तब तक न बायसन बचेगा, न धान, न सड़क, न इज्जत—बस कागजों में सब “दुरुस्त” रहेगा।
अगली बार जब कोई अफसर कहे—“सब कंट्रोल में है”, तो समझ जाइए कंट्रोल सिर्फ बयान में है। और जब कोई नेता नारी सम्मान की बात करे, तो उसकी चुप्पी भी देखिए—कब और कहां बोलती है।
इस देश को ब्रेकर नहीं, भ्रष्टाचार पर ब्रेक लगाने वाले ईमानदार नेता और अफसर चाहिए।
और अंत में—
जो तौर-तरीका है दुनिया का,
उसी तौर-तरीके से बोलो।
बहरों का इलाका है,
ज़रा ज़ोर से बोलो।।
#जय_हो
📍 26 अप्रैल 2026, कवर्धा (छत्तीसगढ़)




