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61 ग्राम सोना… और 10 लाख की खामोशी का गणित!कहते हैं सोना जितना तपता है, उतना निखरता है। इन दिनों 61 ग्राम सोना भी खूब तपा — “मगर निखरने की बजाय ऐसा पिघला कि कार्रवाई ही शून्य हो गई”

बात बेबाक
चंद्र शेखर शर्मा (पत्रकार)
📞 9425522015
गरियाबंद से निकली जप्ती, वर्दी की मौजूदगी, इलेक्ट्रॉनिक तराजू पर तौल, फोटो खिंचे, कागज़ी कार्रवाई हुई… और फिर फाइल ने ऐसा योगासन लगाया कि आज तक समाधि नहीं टूटी।
61 ग्राम का वजन तराजू पर भले कम हो, मगर उसकी कहानी का वजन पूरे सिस्टम पर भारी पड़ रहा है। चौक–चौराहों से लेकर दफ्तरों तक बस एक ही चर्चा — “जप्ती हुई… पर कार्रवाई कहाँ गई?”
सोना या सिस्टम का पीला आईना?
चर्चा है कि यह सिर्फ सोना नहीं था, बल्कि भ्रष्ट सिस्टम का पीला आईना था — जिसमें हर चेहरा साफ दिखाई दे रहा है।
जप्ती हुई, पर कार्रवाई गायब… जैसे जादूगर टोपी से कबूतर निकाले और फिर टोपी ही गायब कर दे।
61 ग्राम की इस कहानी के नायक भी कम दिलचस्प नहीं बताए जा रहे। एक युवा नेता — जो जनसेवा की मशाल लेकर निकले थे — इन दिनों दलाली की रोशनी में ज्यादा चमकते नजर आ रहे हैं।वर्दीधारी अफसर और युवा नेता का ऐसा समन्वय कि लगता है लोकतंत्र नहीं, “लाभतंत्र” चल रहा है।
एक तरफ कानून की किताब, दूसरी तरफ समझौते की डायरी… और बीच में 61 ग्राम का मौन सत्य।
3M, 5KP और 2GP का चर्चित गणित
इन दिनों 61 ग्राम की कहानी में एक नया गणित खूब तैर रहा है —
3M — तीन लाख, खामोशी के लिए?
5KP — पाँच लाख, वर्दी के “सम्मान” हेतु?
2GP — दो लाख, दूसरे जिले की “शांति” के नाम पर?
कुल मिलाकर 10 लाख का वह संतुलन — जिसमें न्याय शून्य और बंटवारा पूर्ण बताया जा रहा है।
यह सूत्र कितना सटीक है, कितना काल्पनिक — यह तो वही जानें जिनकी भूमिका रही। मगर सवाल यह जरूर है कि क्या अब ईमान भी ग्राम और लाख में तौला जाने लगा है?
जांच जारी… यह शब्द बड़ा लचीला है
बताया जाता है कि फाइलें दौड़ीं, फोन घनघनाए, बैठकें हुईं।
हर बैठक में चाय मीठी थी… और बात कड़वी नहीं हुई।
आखिर कड़वाहट से काम बिगड़ता है, मिठास से मामला “सेटल” होता है।और जब मामला सेटल हो जाए, तो जनता को समझा दिया जाता है — “जांच जारी है।”
यह “जारी” शब्द बड़ा लचीला होता है। सालों तक खिंच सकता है — ठीक वैसे ही जैसे चुनावी वादे चुनावी मंच पर।
असली सवाल: ईमान का वजन कितना था?
अब यह सवाल बेमानी हो चुका है कि 61 ग्राम सोना चोरी का था या नहीं।
असली सवाल यह है — ईमान का वजन कितना था?
यदि 61 ग्राम इतना हल्का था कि कार्रवाई शून्य हो गई, तो क्या ईमान भी अब ग्रामों में तौला जाने लगा है?
चौक-चौराहों पर चर्चा है, सबको पता है — पर किसी को “आधिकारिक” पता नहीं।
अजब है… पर गजब है।
218 करोड़ की फाइल और सक्रिय चेहरे?
चलते-चलते एक और फुसफुसाहट —
क्या 218 करोड़ के कथित घपले और लापरवाही की फाइल को दबाने के लिए भी दलाल नेता सक्रिय हैं?
समाजिक चेहरों की सक्रियता, अंदरखाने की रणनीति, और फाइलों का शांत रहना — यह सब क्या महज संयोग है?
जनता मुस्कुरा रही है — मगर वह मुस्कान कड़वी है।
उसे मालूम है कि 61 ग्राम की जप्ती से ज्यादा भारी 10 लाख की फुसफुसाहट होती है।
और जब तक यह बाजार गर्म रहेगा, हर जप्ती के बाद कार्रवाई की शून्यता का ही सोना खनकता रहेगा।
अंत में…
जो बात घर में हुई थी, वो आज बाज़ार में है,
कोई तो सुराख़ यक़ीनन मेरी दीवार में है।

प्रशांत गौतम

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