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“नारी वंदन की पटकथा धड़ाम: महिला आरक्षण गिरते ही ‘अजन्मे 300 माननीयों’ पर सियासी रुदाली, जनता बोली—चलो बोझ टला!”


बात बेबाक
चंद्र शेखर शर्मा (पत्रकार) | 9425522015
भारतीय राजनीति भी बड़ी अजब-गजब है—यहाँ जो कहा जाता है, वह किया नहीं जाता और जो किया जाता है, वह कहा नहीं जाता। इन दिनों राजनीति का रंगमंच एक नई पटकथा के साथ फिर चर्चा में है। इस बार कहानी में “नारी वंदन” के बहाने महिला आरक्षण का औंधे मुँह गिरना और उसके बाद 300 माननीयों की कथित “भ्रूण हत्या” पर मचा रुदाली-रुदन भी शामिल है।
कहा जा रहा है कि महिला आरक्षण के गिरते ही 300 माननीयों का “जन्म” होने से पहले ही अंत हो गया। राजनीति के मंच का यह दृश्य इतना करुण भी है और उतना ही हास्यास्पद भी, कि जनता जनार्दन तय नहीं कर पा रही—ताली बजाए या सिर पकड़ ले।
बताया जाता है कि ये कोई साधारण भ्रूण नहीं थे, बल्कि वे “भावी माननीय” थे, जो अभी अस्तित्व में भी नहीं आए थे, लेकिन उनके बंगले, गाड़ियाँ, सुरक्षा, पीए, रसोइए, वेतन-भत्ते, मुफ्त इलाज, हवाई यात्राएँ और सबसे अहम—पेंशन का बोझ जनता पहले से महसूस करने लगी थी। ऐसे में इन “अजन्मे माननीयों” के न आने पर जनता ने राहत की साँस ली—चलो, इस बार बच गए!
महिला आरक्षण को लेकर सियासी गलियारों में गप्पू भैया, पप्पू और टोंटी चोर जैसे किरदारों की बयानबाज़ी चरम पर है। उनके भाषणों में दर्द, आक्रोश और राजनीतिक गणित का ऐसा मिश्रण है मानो कोई राष्ट्रीय आपदा आ गई हो। वे बताते नहीं थकते कि कैसे महिलाओं के अधिकारों का हनन हुआ।
दूसरी ओर, पप्पू और टोंटी चोर के चेहरे पर दिखती कुटिल मुस्कान कुछ और ही कहानी बयाँ करती है। उनके अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम सत्ता का एक सुनियोजित मास्टरस्ट्रोक है—पहले आरक्षण का सपना दिखाओ, फिर उसे गिराकर सहानुभूति बटोर लो, और जनता को समझाओ कि असली लड़ाई अभी बाकी है।
इस पूरे राजनीतिक नाटक का सबसे दिलचस्प किरदार है—जनता जनार्दन। वही जनता, जो हर चुनाव में उम्मीदों का नया “लखटकिया सूट” पहनकर निकलती है, लेकिन पाँच साल में वही सूट फटकर पोंछा बनने लायक भी नहीं बचता।
महिला आरक्षण का मुद्दा अपने आप में बेहद गंभीर है, लेकिन हमारे माननीयों की प्राथमिकताएँ अक्सर गंभीरता से दूर ही रहती हैं। यहाँ हर गंभीर मुद्दा पहले राजनीतिक अखाड़ा बनता है, फिर टीवी डिबेट का मसाला और अंततः व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का सिलेबस।
महिलाओं के अधिकारों से ज्यादा चर्चा इस बात पर होती है कि किसे कितनी सीट मिलेगी और किसकी कुर्सी खिसकेगी। विडंबना देखिए—जो नेता कल तक महिलाओं के सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे कर रहे थे, वही आज सीटों के गणित में उलझे हैं कि इससे उनका लाभ होगा या नुकसान।
राजनीति के इस रंगमंच पर “नारी वंदन” की आड़ में चल रही पटकथा ने एक बात साफ कर दी है—भारतीय राजनीति में कोई भी मुद्दा पवित्र नहीं होता। हर मुद्दा किसी के लिए सत्ता में बने रहने का माध्यम है, तो किसी के लिए सत्ता तक पहुँचने का रास्ता।
और जनता जनार्दन? वह अब भी वहीं खड़ी है—ताली भी बजा रही है और तंज भी कस रही है। उसे पता है कि ये 300 “अजन्मे माननीय” भले ही आज न आए हों, लेकिन लोकतंत्र की इस उर्वर भूमि में ऐसे बीज कभी खत्म नहीं होते। वे फिर जन्म लेंगे—नई शक्ल में, नए नारे के साथ और सुविधाओं के नए पैकेज के साथ।
चलते-चलते:
होलिका, सीता या पद्मावती—समाज अक्सर उन्हीं स्त्रियों को पूजता है जो जलकर मरने को तैयार हों। जो जीकर लड़ती हैं, उन्हें या तो फूलन देवी कहा जाता है या शूर्पणखा बनाकर उपहास किया जाता है।
और अंत में:
ख़बर छुपाई जाती है, अफ़वाह उड़ाई जाती है,
यह वो जमाना है जहाँ—
कहानी कुछ और होती है, सुनाई कुछ और जाती है।
#जय_हो
18 अप्रैल 2026, कवर्धा (छत्तीसगढ़)
(डिस्क्लेमर: “बात बेबाक” सिरिफ सिस्टम ऊपर काल्पनिक वियन्ग हे , जीवित या मुरदा नेता , अधिकारी या अउ काखरो ले कोनो सम्बंध नई हावय । काखरो ले समानता हर मात्र संयोग होही)

प्रशांत गौतम

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