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सुनील सिंह की जनहित याचिका बनी मील का पत्थर गुरुग्राम में ‘स्टिल्ट+4’ पर हाईकोर्ट की ब्रेक –

गुरूग्राम : – गुरुग्राम के तेजी से फैलते शहरी मॉडल को एक बड़ा झटका देते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्टिल्ट + 4 फ्लोर नीति के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड सुनील सिंह की जनहित याचिका पर पारित हुआ है और इसे शहरी नियोजन तथा पर्यावरण संतुलन के संदर्भ में एक मील का पत्थर माना जा रहा है।

अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि शहर का मौजूदा बुनियादी ढांचा पहले ही दबाव में है और बिना “इन्फ्रास्ट्रक्चर कैपेसिटी ऑडिट” के अतिरिक्त मंज़िलों की अनुमति देना शहर को अव्यवस्था की ओर धकेल सकता है।

क्या है पूरा मामला –
मामला “स्टिल्ट + 4 फ्लोर” नीति से जुड़ा है, जिसके तहत गुरुग्राम में रिहायशी प्लॉट्स पर अतिरिक्त मंज़िलों के निर्माण को अनुमति दी गई थी। याचिका में यह सवाल उठाया गया कि क्या शहर की मौजूदा आधारभूत संरचना इस बढ़ते बोझ को संभालने के लिए तैयार है।

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि बढ़ती आबादी और निर्माण के मुकाबले शहर की मूल सुविधाएं जैसे पानी, सीवरेज, ड्रेनेज और सड़कें पहले ही अपनी सीमा पर हैं।

चौकाने वाले तथ्य –
कोर्ट द्वारा कराए गए निरीक्षण में चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई। जिन सड़कों की चौड़ाई कागजों में 10 से 12 मीटर बताई गई थी, उनकी वास्तविक मोटरेबल चौड़ाई कई जगहों पर केवल 3.9 से 4.8 मीटर पाई गई।

इसका सीधा असर ट्रैफिक, आपातकालीन सेवाओं और आम नागरिकों की आवाजाही पर पड़ रहा है। अदालत ने माना कि इस तरह की स्थिति में अतिरिक्त मंज़िलों का निर्माण समस्या को और गंभीर बना देगा।

कोर्ट का आदेश क्या है –
हाईकोर्ट ने 2 जुलाई 2024 की उस अधिसूचना के प्रभाव और संचालन पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसके तहत “स्टिल्ट + 4” नीति लागू की गई थी। इसके साथ ही नए निर्माण अनुमोदनों पर रोक , ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट जारी करने पर रोक , नई आवेदनों की प्रक्रिया स्थगित जैसे महत्वपूर्ण निर्देश भी दिए गए।

सरकार पर क्या टिप्पणी हुई –
अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने आवश्यक तैयारी और विशेषज्ञों की सिफारिशों की अनदेखी की है। विशेष रूप से “इन्फ्रास्ट्रक्चर कैपेसिटी ऑडिट” जैसे महत्वपूर्ण कदम को लागू किए बिना नीति को आगे बढ़ाया गया।

कोर्ट ने यह संकेत भी दिया कि राजस्व बढ़ाने की कोशिश में नागरिकों की सुरक्षा और सुविधाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

क्यों अहम है यह फैसला –
यह फैसला सिर्फ गुरुग्राम तक सीमित नहीं है। यह उन सभी शहरों के लिए एक संकेत है जहां तेजी से शहरीकरण हो रहा है लेकिन आधारभूत ढांचा उसी अनुपात में विकसित नहीं हो पा रहा।

सुनील सिंह की इस जनहित याचिका ने एक बार फिर यह स्थापित किया है कि विकास की दिशा तय करते समय संतुलन, जवाबदेही और नागरिक सुविधाओं को केंद्र में रखना अनिवार्य है।

यह मामला केवल एक निर्माण नीति पर रोक का नहीं, बल्कि उस सोच पर सवाल है जिसमें शहरों को ऊंचाई से मापा जाता है, क्षमता से नहीं। हाईकोर्ट का संदेश स्पष्ट है अगर शहर की नींव मजबूत नहीं है, तो उस पर खड़ी हर अतिरिक्त मंज़िल एक जोखिम बन जाती है।

प्रशांत गौतम

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