बात बेबाक:-अटल की दूरदृष्टि, मोदी-शाह की रणनीति और बंगाल में कमल का सूर्योदय

✍️ चंद्र शेखर शर्मा (पत्रकार) | 9425522015
पश्चिम बंगाल में कमल का खिलना केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में वर्षों पहले बोए गए उस बीज का परिणाम है, जिसे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी दूरदृष्टि और राजनीतिक समझ से रोपा था। आज जब बंगाल की राजनीति में भाजपा निर्णायक ताकत बनकर उभरी है, तब अटल जी की वह सोच स्वतः याद आती है, जिसमें वे केवल वर्तमान नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की राजनीति को भी देख लेते थे।
एक दौर ऐसा था जब भाजपा में मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों के चयन से लेकर राष्ट्रीय राजनीतिक समीकरणों तक में अटल जी की निर्णायक भूमिका होती थी, ठीक वैसे ही जैसे आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की मानी जाती है। नरेंद्र मोदी स्वयं अटल जी की राजनीतिक खोज और विश्वास का परिणाम रहे हैं। आज मोदी और उनकी टीम उसी अटल स्वप्न को विस्तार देने में सफल दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अटल जी केवल भाजपा तक सीमित नेता नहीं थे। वे उन राज्यों में भी राजनीतिक जमीन तैयार करते रहे, जहां भाजपा का कोई मजबूत आधार नहीं था। यही वजह रही कि उन्होंने समय-समय पर ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाया, जिन्होंने बाद में भाजपा के विस्तार में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई। बिहार में नीतीश कुमार, उत्तरप्रदेश में मायावती और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को भाजपा के सहयोग से सत्ता तक पहुंचाने के पीछे भी उनकी यही दूरदृष्टि मानी जाती है।
पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का मजबूत किला भाजपा सीधे तौर पर कभी नहीं तोड़ सकती थी। दशकों तक चली वामपंथी राजनीति, संगठनात्मक पकड़ और कथित राजनीतिक हिंसा का जवाब सीधे संघर्ष से देना भाजपा के लिए आसान नहीं था। ऐसे में अटल जी ने “कांटे से कांटा निकालने” की रणनीति अपनाई। ममता बनर्जी को पहले केंद्र में मंत्री बनाया गया, फिर कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस बनाई और अंततः बंगाल की सत्ता तक पहुंचीं। परिणाम यह हुआ कि वामपंथ का वह लाल किला, जो कभी अजेय माना जाता था, धीरे-धीरे इतिहास बन गया।
लेकिन राजनीति का चक्र यहीं नहीं रुका। सत्ता के लंबे दौर में ममता बनर्जी पर अहंकार, हठधर्मिता और सत्ता के केंद्रीकरण के आरोप बढ़ते गए। राजनीतिक विरोधियों का दावा है कि यही कारण रहा कि जनता का एक बड़ा वर्ग उनसे दूर होता चला गया। आज बंगाल की बदलती तस्वीर को भाजपा अपनी दीर्घकालिक रणनीति की सफलता के रूप में देख रही है।
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखें तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अटल जी की दूरदृष्टि को धरातल पर उतारने का काम मोदी-शाह की जोड़ी ने किया है। बिहार में नीतीश कुमार का प्रभाव सीमित होता दिखा, मायावती राजनीतिक हाशिए पर पहुंचीं और बंगाल में ममता बनर्जी की चुनौती भी कमजोर पड़ती नजर आई। भाजपा अब उन राज्यों में भी मजबूत होती दिखाई दे रही है, जहां कभी उसका अस्तित्व बेहद सीमित था।
यदि आज पश्चिम बंगाल में भाजपा का सूर्योदय हुआ है, तो इसका श्रेय केवल वर्तमान नेतृत्व को नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सोच को भी जाता है, जिसकी नींव अटल बिहारी वाजपेयी ने रखी थी। जातीय और वैचारिक राजनीति वाले राज्यों में भाजपा के लिए रास्ता बनाना आसान नहीं था, लेकिन अटल जी ने धैर्य, रणनीति और समय के सहारे वह जमीन तैयार की, जिस पर आज कमल की फसल लहलहा रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धैर्य और रणनीतिक संयम भी इस पूरी प्रक्रिया में उल्लेखनीय रहा। तमाम विवादों और राजनीतिक तनाव के बीच बिना राष्ट्रपति शासन लगाए, केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी में चुनाव प्रक्रिया को नियंत्रित रखना और निष्पक्ष चुनाव का संदेश देना भाजपा की बड़ी राजनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है। यही कारण है कि आज बंगाल की राजनीति में “खेला” का जवाब भाजपा अपने अंदाज में देती दिखाई दे रही है।
चलते-चलते…
नारी वंदन के बहाने विपक्ष और पक्ष के जलते पुतलों के बीच जिले की दबंग महिला विधायिका का वन विभाग के आमंत्रण पत्र से नाम कटवाने में आखिर किसकी दरियादिली काम कर गई?
और अंत में…
ना हाथ मिलाया, न गले मिले, न मयस्सर तुम्हारी दीद हुई,
अब तुम्हीं बताओ जानां, ये कयामत हुई या ईद हुई।।
#जय_हो
📍 04/05/2026, कवर्धा (छत्तीसगढ़)



