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केशकाल बायपास बना “ग्रीन स्कैम” का प्रतीक: सड़क से पहले उजड़ गया जंगल, गलत सर्वे ने निगल लिए 14 हजार पेड़!

छत्तीसगढ़ उजाला-बस्तर की लाइफलाइन माने जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-30 पर बन रहे केशकाल बायपास परियोजना में ऐसा बड़ा खेल सामने आया है, जिसने सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सड़क अभी तक जमीन पर नहीं उतरी, लेकिन हजारों हरे-भरे पेड़ जरूर हमेशा के लिए खत्म हो गए। गलत अलाइनमेंट, विभागीय तालमेल की कमी और अफसरों की कथित लापरवाही के चलते 5 किलोमीटर क्षेत्र में 8,159 पेड़ों की कटाई कर दी गई। अब खुलासा हुआ है कि जिस जगह जंगल साफ किया गया, वहां सड़क बनेगी ही नहीं।

कोंडागांव जिले के बहुप्रतीक्षित 11.38 किलोमीटर लंबे केशकाल बायपास को बस्तर के आर्थिक कॉरिडोर के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। लेकिन निर्माण शुरू होने से पहले ही यह परियोजना विवादों में घिर गई है। जानकारी के मुताबिक, जिस अलाइनमेंट के आधार पर पेड़ों की कटाई कराई गई, वह वास्तविक मार्ग से करीब 100 मीटर अलग निकला। यानी विभागों ने पहले जंगल कटवा दिया और बाद में पता चला कि सड़क तो दूसरी दिशा में बनाई जानी है।

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि गलत अलाइनमेंट पर पेड़ों की कटाई के लिए करीब 2.75 करोड़ रुपये का भुगतान भी कर दिया गया। बताया जा रहा है कि 11.38 किलोमीटर में से लगभग 5 से 6 किलोमीटर हिस्सा पूरी तरह गलत सर्वे पर आधारित था। परिणाम यह हुआ कि सड़क तो नहीं बनी, लेकिन जंगल जरूर साफ हो गया।


पूरे मामले की बड़ी बातें:
5 किलोमीटर क्षेत्र में 8,159 पेड़ों की कटाई
गलत अलाइनमेंट पर ₹2.75 करोड़ का भुगतान
दो विभागों की लापरवाही से भारी पर्यावरणीय नुकसान
अब सही अलाइनमेंट पर 6 हजार से ज्यादा और पेड़ कटने की तैयारी
कुल मिलाकर 14 हजार से ज्यादा पेड़ों पर संकट
120 करोड़ की परियोजना बढ़कर 308 करोड़ तक पहुंची
अब फिर कटेंगे हजारों पेड़!


सरकारी लापरवाही का सबसे खतरनाक पहलू अब सामने आ रहा है। सड़क निर्माण के लिए अब सही अलाइनमेंट पर दोबारा जंगल की कटाई करनी पड़ेगी। यानी पहले 8 हजार से ज्यादा पेड़ काटे गए और अब 6 हजार से अधिक पेड़ों को फिर से काटने की तैयारी है। एक गलत सर्वे और विभागीय अव्यवस्था ने बस्तर के जंगलों पर बड़ा खतरा खड़ा कर दिया है।

केशकाल बायपास परियोजना की शुरुआत वर्ष 2016-17 में हुई थी, जब केंद्र सरकार ने इसके लिए 120 करोड़ रुपये मंजूर किए थे। मुंबई की एक कंपनी को ठेका मिला और शुरुआती काम भी शुरू हुआ, लेकिन कुछ ही महीनों में परियोजना ठप पड़ गई। इसके बाद लगभग एक दशक तक फाइलें इधर-उधर घूमती रहीं।
वर्ष 2025 में इस परियोजना को दोबारा मंजूरी मिली और लागत बढ़कर 308 करोड़ रुपये पहुंच गई। दुर्ग के एक ठेकेदार को काम सौंपा गया, लेकिन चार महीने बीत जाने के बाद भी वर्क ऑर्डर जारी नहीं हो सका।

अब सवाल सिर्फ गलती का नहीं, जवाबदेही का भी है। आखिर बिना अंतिम सर्वे और सत्यापन के पेड़ों की कटाई की अनुमति कैसे मिल गई? वन विभाग ने गलत मार्किंग कैसे कर दी? राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग ने करोड़ों का भुगतान किस आधार पर किया? और जब गलती सामने आ गई तो जिम्मेदार अधिकारियो पर कार्यवाही क्यों नहीं हुई?
स्थानीय स्तर पर इस मामले को लेकर भारी नाराजगी है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर मामले को दबाने की कोशिश कर रहे हैं।

केशकाल की डीएफओ दिव्या गौतम ने स्वीकार किया है कि अलाइनमेंट से हटकर पेड़ों की कटाई हुई है। उन्होंने बताया कि मामले की जांच के लिए टीम गठित की गई है और मौके पर दोबारा सर्वे व मार्किंग कराई जा रही है।
वहीं वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के उप सचिव डी.आर. सोंटापर ने पीसीसीएफ को पत्र लिखकर विस्तृत जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। हालांकि बड़ा सवाल अब भी यही है कि क्या इस बार भी जांच सिर्फ फाइलों तक सीमित रह जाएगी?

बस्तर के जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि वहां की पहचान, संस्कृति और जीवन का हिस्सा हैं। लेकिन विकास के नाम पर हुई इस भारी लापरवाही ने हजारों पेड़ों की बलि ले ली। एक तरफ सरकार पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बचाने के दावे करती है, दूसरी तरफ गलत सर्वे और विभागीय अव्यवस्था के कारण जंगल साफ कर दिए जाते हैं।


केशकाल बायपास अब केवल एक सड़क परियोजना नहीं रह गया, बल्कि सरकारी सिस्टम की लापरवाही, अव्यवस्था और कथित भ्रष्टाचार का बड़ा प्रतीक बन चुका है। सड़क अभी तक नहीं बनी, लेकिन जंगल हमेशा के लिए खत्म हो गए। अब सबसे बड़ा सवाल यही है — इस “ग्रीन स्कैम” की असली जिम्मेदारी कौन लेगा?

प्रशांत गौतम

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