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रेत खनन पर रिपोर्ट छपते ही सियासी तिलमिलाहट, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बड़े नेताओं के फोन और धमकी , परिवार की जानकारी लेने तक पहुंचे कॉल


एम. सी. बी. (छत्तीसगढ़ उजाला)-एमसीबी जिले में बहने वाली केवई नदी इन दिनों अवैध रेत खनन के आरोपों को लेकर सुर्खियों में है। कभी जीवनदायिनी मानी जाने वाली यह नदी अब कथित तौर पर राजनीतिक संरक्षण में चल रहे खनन खेल का केंद्र बनती जा रही है। सुनहरी रेत, जो विकास कार्यों की बुनियाद मानी जाती है, अब सवालों के घेरे में है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि दिन में सन्नाटा और रात के अंधेरे में मशीनों की आवाज़—यह सिलसिला लंबे समय से जारी है। नदी के किनारों पर भारी मशीनों की आवाजाही और तेज रफ्तार डंपरों की आवाज ने ग्रामीणों की नींद और सुकून दोनों छीन लिए हैं।
चर्चा यह भी है कि केवई नदी में अवैध रेत खनन का काम एक स्थानीय कांग्रेसी नेता के संरक्षण में संचालित हो रहा है, जो खुलेआम अपनी ऊँची राजनीतिक पकड़ का हवाला देता है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र में यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
खबर प्रकाशित होने के बाद एक नया मोड़ सामने आया है। सूत्रों के अनुसार, रिपोर्ट सामने आते ही कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं के फोन संबंधित लोगों के पास आने लगे। बताया जा रहा है कि फोन कॉल्स के दौरान खबर प्रकाशित करने वाले के घर-परिवार के बारे में जानकारी ली जाने लगी। इस घटनाक्रम ने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
राजनीतिक गलियारों में यह भी कहा जा रहा है कि मामला केवल एक दल तक सीमित नहीं है। कांग्रेस हो या भाजपा—दोनों पर समय-समय पर रेत खनन को लेकर आरोप लगते रहे हैं। हालांकि किसी भी दल ने इन विशिष्ट आरोपों पर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं दी है।
इधर, खनिज विभाग की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। वन विभाग की चुप्पी और पुलिस की कथित निष्क्रियता को लेकर भी जनमानस में असंतोष है। यदि खनन पूरी तरह नियमों के तहत हो रहा है, तो रात के समय भारी मशीनों की गतिविधि क्यों जारी रहती है?
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित रेत खनन से नदी की धारा बदल सकती है, भू-जल स्तर प्रभावित हो सकता है और आसपास के गांवों पर दीर्घकालिक दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं।
अब जनता पूछ रही है—
यह सिर्फ रेत का कारोबार है या लोकतंत्र के मूल्यों का भी अपहरण?
जब तक जिम्मेदार विभाग पारदर्शी जांच और स्पष्ट कार्रवाई नहीं करते, तब तक केवई नदी की कराह मशीनों की गड़गड़ाहट में दबती रहेगी और सवाल उठते रहेंगे।

प्रशांत गौतम

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