कुलपति साहब की ‘शिक्षा यात्रा’ के चर्चे अब बाजारों तक!बैठकें अपनी जगह, यात्राएं अपनी जगह और ‘खास मुलाकातों’ के लिए भी निकल ही आता है वक्त!
रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा जगत में इन दिनों एक विश्वविद्यालय के कुलपति साहब को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सरगर्म हैं। विश्वविद्यालय के गलियारों में शुरू हुई कानाफूसी अब शहर के सार्वजनिक ठिकानों और बाजारों तक पहुंचने की बात कही जा रही है। चर्चाओं में कुलपति की कथित यात्राओं, निजी मुलाकातों, समय प्रबंधन और आर्थिक मामलों को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, इनमें से कई दावों की स्वतंत्र अथवा दस्तावेजी पुष्टि फिलहाल सामने नहीं आई है।
कुलपति साहब के बारे में चर्चा करने वाले लोग उनके ‘टाइम मैनेजमेंट’ को लेकर खासे व्यंग्यात्मक अंदाज में किस्से सुनाते हैं। कहा जाता है कि विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण बैठकों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच भी निजी यात्राओं और मुलाकातों के लिए समय निकाल लिया जाता है। सवाल यह है कि यदि ये यात्राएं सरकारी दायित्व से जुड़ी थीं तो उनका आधिकारिक रिकॉर्ड क्या कहता है और यदि निजी थीं तो उनसे संबंधित खर्च का भार किस पर पड़ा?
कोलकाता यात्रा का किस्सा क्यों चर्चा में?
विश्वविद्यालयी गलियारों में कोलकाता यात्रा से जुड़ा एक किस्सा भी खूब सुनाया जा रहा है। चर्चाएं करने वाले लोग होटल, कार और एक कथित ‘खास मेहमान’ तक का जिक्र करते हैं। बताया जाता है कि एक भोजन की मेज पर लंबी बातचीत हुई और इसके बाद सभी अपने-अपने रास्ते चले गए।
लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि इस पूरे घटनाक्रम की पुष्टि करने वाला कोई सार्वजनिक दस्तावेज या स्वतंत्र प्रमाण फिलहाल सामने नहीं है। इसलिए किसी व्यक्ति के निजी जीवन को लेकर चल रही चर्चाओं को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
महिला मित्र को लेकर भी चर्चाएं
कुलपति साहब के किसी महिला मित्र से कथित नजदीकी और लंबे समय तक चैटिंग किए जाने जैसी बातें भी चर्चा का हिस्सा बनी हुई हैं। मगर ये दावे भी निजी जीवन से संबंधित हैं और इनके समर्थन में कोई सत्यापित सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है।
ऐसे में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कोई अधिकारी निजी तौर पर किससे मिलता-जुलता है या किससे बातचीत करता है। असली सवाल तब खड़ा होता है, जब निजी गतिविधियों का संबंध सरकारी पद, विश्वविद्यालय के संसाधनों, आधिकारिक यात्राओं अथवा सार्वजनिक धन से जुड़ने लगे।
संपत्ति और आर्थिक मामलों पर भी उठ रहे सवाल
चर्चाओं का एक सिरा कुलपति साहब की कथित संपत्ति और धन अर्जित करने से जुड़े सवालों तक भी पहुंच रहा है। हालांकि, बिना दस्तावेजी प्रमाण के किसी की संपत्ति या आय को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को सच मान लेना उचित नहीं होगा।
फिर भी यदि किसी सार्वजनिक पदाधिकारी की आय, संपत्ति, सरकारी यात्राओं, यात्रा व्यय या विश्वविद्यालय के संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर गंभीर शिकायतें अथवा दस्तावेज सामने आते हैं, तो संबंधित विभागों और सक्षम जांच एजेंसियों के लिए उनकी जांच करना जरूरी हो जाता है।
सवाल निजी जिंदगी का नहीं, सार्वजनिक जवाबदेही का
कुलपति का पद महज एक प्रशासनिक कुर्सी नहीं है। विश्वविद्यालय के हजारों विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों की व्यवस्था, शैक्षणिक वातावरण और संस्थान की प्रतिष्ठा इस पद से जुड़ी होती है।
इसलिए यदि किसी कुलपति को लेकर लगातार चर्चाएं सामने आ रही हैं तो विश्वविद्यालय प्रशासन को भी पारदर्शिता के साथ यह स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित यात्राएं किस उद्देश्य से हुईं, उनका खर्च किस मद से हुआ, कौन-कौन से कार्यक्रम आधिकारिक थे और विश्वविद्यालय के संसाधनों का उपयोग निर्धारित नियमों के अनुसार हुआ या नहीं।
गलियारों में तंज—‘टाइम मैनेजमेंट’ कमाल का है!
कुलपति साहब को जानने का दावा करने वाले कुछ लोग व्यंग्य में कहते हैं—
“वीसी साहब बड़े संस्कारी हैं… काम भी करते हैं और अपने लिए समय का प्रबंधन भी गजब का करते हैं!”
इसी तरह विश्वविद्यालयी चर्चाओं में एक और चुटकी सुनाई दे रही है—
“पढ़ाई का सिलेबस लंबा हो सकता है, लेकिन साहब का ‘टाइम मैनेजमेंट’ उससे भी ज्यादा एडवांस है!”
बहरहाल, व्यंग्य और चर्चाओं से अलग असली सवाल रिकॉर्ड और तथ्यों का है। यदि इन यात्राओं, खर्चों, संपत्ति या सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर कोई दस्तावेज सामने आते हैं तो मामला महज विश्वविद्यालयी गपशप नहीं रहेगा, बल्कि जवाबदेही का विषय बन सकता है।
और यदि इन चर्चाओं के पीछे कोई तथ्य नहीं है, तो संबंधित विश्वविद्यालय या अधिकारी को स्थिति स्पष्ट कर अफवाहों पर विराम लगाना चाहिए।
फिलहाल चर्चाएं जारी हैं, सवाल कायम हैं और निगाहें इस बात पर हैं कि ‘कुलपति साहब की शिक्षा यात्रा’ के इन किस्सों के पीछे आखिर कितनी सच्चाई है—और कितनी सिर्फ बाजार की गर्मागर्म चर्चा।




