त्योहारों पर जागता खाद्य विभाग, फिर क्यों छा जाती है खामोशी?छापे, सैंपल और जब्ती के बाद कार्रवाई का हिसाब कहां? जनता पूछ रही—कितने लाइसेंस रद्द हुए, कितनों पर चला मुकदमा?
रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-त्योहार आते ही खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। मिठाई, मावा, पनीर, दूध, घी, खाद्य तेल और अन्य खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के नाम पर दुकानों और प्रतिष्ठानों में छापेमारी होती है। नमूने लिए जाते हैं, संदिग्ध खाद्य सामग्री जब्त की जाती है और कार्रवाई की तस्वीरें व आंकड़े सामने आते हैं।
लेकिन त्योहार बीतने के बाद यही सक्रियता धीरे-धीरे नजरों से ओझल हो जाती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि खाद्य सुरक्षा क्या केवल त्योहारों तक सीमित है या फिर आम नागरिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा पूरे 365 दिन विभाग की प्राथमिकता होनी चाहिए?
छापा पड़ा, सैंपल लिया… फिर क्या हुआ?
त्योहारों के दौरान खाद्य विभाग की कार्रवाई को लेकर हर साल बड़ी-बड़ी खबरें सामने आती हैं। लेकिन जनता के सामने असली तस्वीर तब आएगी, जब विभाग यह भी बताए कि इन छापों के बाद अंतिम कार्रवाई क्या हुई।
कितने प्रतिष्ठानों की जांच की गई? कितने नमूने लिए गए? इनमें से कितने नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे? कितने मामलों में खाद्य पदार्थ असुरक्षित या मिलावटी पाए गए? कितने कारोबारियों पर जुर्माना लगाया गया? कितने लाइसेंस निलंबित या निरस्त किए गए? और कितने मामलों में न्यायालय में अभियोजन की कार्रवाई शुरू हुई?
सबसे अहम सवाल यह है कि मिलावट पाए जाने के बाद वास्तव में कितने होटल, रेस्टोरेंट, मिठाई दुकान या अन्य खाद्य प्रतिष्ठानों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई हुई, जिसका असर जमीन पर दिखाई दिया?
सिर्फ नमूना लेना और जब्ती की कार्रवाई करना खाद्य सुरक्षा की अंतिम मंजिल नहीं हो सकती। कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया और उसके परिणाम को भी सार्वजनिक किया जाना जरूरी है।
FSSAI के निर्देश, लेकिन स्थानीय स्तर पर परिणाम का हिसाब जरूरी
खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की ओर से भी त्योहारों के दौरान मिलावट के खिलाफ विशेष अभियान चलाने और दूध एवं दुग्ध उत्पाद, मिठाई, नमकीन, खाद्य तेल, घी और अन्य खाद्य पदार्थों की जांच व सैंपलिंग पर जोर दिया जाता रहा है।
ऐसे अभियानों का उद्देश्य केवल जांच की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि असुरक्षित खाद्य पदार्थों की बिक्री पर प्रभावी रोक लगाना है। इसलिए अभियान खत्म होने के बाद उसकी परिणाम रिपोर्ट भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
जनता को यह जानने का अधिकार है कि अभियान के दौरान सामने आई गड़बड़ियों पर आगे क्या हुआ।
क्या त्योहार खत्म होते ही मिलावट भी खत्म हो जाती है?
मिलावटी दूध, पनीर, मावा, तेल, मसाले और मिठाइयों की बिक्री केवल दीपावली, होली या रक्षाबंधन के आसपास ही नहीं होती। होटल, रेस्टोरेंट, ढाबे, मिठाई दुकान और अन्य खाद्य प्रतिष्ठान पूरे साल संचालित होते हैं। ऐसे में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की निगरानी भी पूरे वर्ष नियमित रूप से होना जरूरी है।
यदि किसी दुकान या प्रतिष्ठान में त्योहार के दौरान मिलावट मिलती है तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि वहां नियमित दिनों में क्या स्थिति रहती है। इसी तरह बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों की पहचान कर उन पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
खाद्य विभाग की किसी भी कार्रवाई का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने छापे पड़े या कितने सैंपल लिए गए। असली सवाल यह है कि उन सैंपलों की रिपोर्ट में क्या सामने आया और उसके बाद विभाग ने क्या किया।
एक पारदर्शी व्यवस्था के तहत विभाग समय-समय पर सार्वजनिक रिपोर्ट जारी कर सकता है, जिसमें—
कितने प्रतिष्ठानों का निरीक्षण हुआ
कितने खाद्य नमूने लिए गए
कितने नमूने फेल हुए
कितने मामलों में जुर्माना लगाया गया
कितने लाइसेंस निलंबित या निरस्त किए गए
कितने मामलों में अभियोजन दर्ज हुआ
कितने मामलों का न्यायालय में निराकरण हुआ
और दोबारा नियम तोड़ने वालों पर क्या कार्रवाई की गई
इस तरह की जानकारी सामने आने से जनता को भी पता चलेगा कि विभाग की कार्रवाई केवल कागजों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित है या वास्तव में उसका असर भी हो रहा है।
‘लेनदेन’ की चर्चाओं पर भी पारदर्शिता से लगेगा विराम
बाजार और आम लोगों के बीच अक्सर यह चर्चा सुनाई देती है कि छापेमारी के बाद कुछ मामले आगे नहीं बढ़ते और समय बीतने के साथ ठंडे पड़ जाते हैं। हालांकि, बिना प्रमाण किसी अधिकारी या कारोबारी पर लेनदेन का आरोप लगाना उचित नहीं है।
लेकिन ऐसी चर्चाओं और आशंकाओं को खत्म करने की जिम्मेदारी विभाग की पारदर्शी कार्रवाई से ही पूरी हो सकती है।
यदि सैंपल की रिपोर्ट, प्रकरण की स्थिति, जुर्माना और लाइसेंस संबंधी कार्रवाई जैसी जानकारी समय-समय पर सार्वजनिक की जाए तो सवाल उठने की गुंजाइश भी कम होगी और दोषी पाए जाने वाले कारोबारियों पर कार्रवाई का भरोसा भी मजबूत होगा।
जनता को छापे की तस्वीर नहीं, अंतिम कार्रवाई का हिसाब चाहिए
आम नागरिक अपने परिवार के लिए दूध, पनीर, मिठाई, खाद्य तेल या तैयार भोजन खरीदता है। उसे यह जानने का अधिकार है कि जो खाद्य सामग्री उसके घर तक पहुंच रही है, वह सुरक्षित है या नहीं।
इसलिए खाद्य विभाग की सफलता का पैमाना केवल त्योहारों के दौरान की गई छापेमारी नहीं होना चाहिए। असली सफलता तब मानी जाएगी जब मिलावटखोरों पर कार्रवाई हो, दोषियों से जुर्माना वसूला जाए, गंभीर मामलों में लाइसेंस रद्द हों, अभियोजन पूरा हो और दोबारा नियम तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई हो।
खाद्य सुरक्षा किसी त्योहार विशेष का अभियान नहीं, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ी सालभर की जिम्मेदारी है। त्योहार खत्म हो सकता है, लेकिन सुरक्षित भोजन पाने का नागरिकों का अधिकार खत्म नहीं होता।
इसलिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि त्योहार में कितने छापे पड़े?
सवाल यह है—
“छापा तो पड़ा था… सैंपल भी लिया गया था… लेकिन उसके बाद हुआ क्या?”
जनता को अब इसी सवाल का पूरा और सार्वजनिक जवाब चाहिए।




