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RES कार्यालय में खतरे के साए में कर्मचारी, जर्जर छत से गिर रहा प्लास्टर, सरिया बाहर; जिम्मेदार कब लेंगे सुध

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही(छत्तीसगढ़ उजाला)-जिले में ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) के कार्यपालन अभियंता कार्यालय की जर्जर हालत कर्मचारियों और कार्यालय पहुंचने वाले लोगों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। बताया जा रहा है कि यह भवन वर्ष 1982 में बनाया गया था और करीब चार दशक से अधिक पुराना होने के कारण अब इसकी हालत बेहद खराब हो चुकी है।

वर्षों पुराने इस भवन में अधिकारी-कर्मचारी आज भी बैठकर काम करने को मजबूर हैं। कार्यालय की छत का प्लास्टर जगह-जगह से टूटकर गिर रहा है। कई हिस्सों में छत की सरिया तक दिखाई देने लगी है, जिससे भवन की मजबूती और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

स्थिति ऐसी है कि छत से प्लास्टर का हिस्सा कभी भी अचानक गिर सकता है। कार्यालय में प्रतिदिन बड़ी संख्या में कर्मचारी काम करते हैं, वहीं विभिन्न शासकीय कार्यों के लिए आम लोगों का भी आना-जाना लगा रहता है। ऐसे में किसी भी समय दुर्घटना होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

चार दशक से ज्यादा पुराना भवन, फिर भी नहीं हुई ठोस पहल

वर्ष 1982 में निर्मित इस भवन को चार दशक से अधिक समय बीत चुका है। समय के साथ भवन की छत और अन्य हिस्सों में लगातार खराबी आने के बावजूद इसकी स्थिति को लेकर अब तक ठोस कार्रवाई नहीं होने पर सवाल उठ रहे हैं। कर्मचारियों के बीच भी जर्जर भवन को लेकर चिंता बनी हुई है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी कार्यालय में काम करने वाले अधिकारी-कर्मचारियों के लिए सुरक्षित कार्यस्थल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी है? जब छत का प्लास्टर लगातार गिर रहा है और सरिया तक बाहर दिखाई दे रही है, तो जिम्मेदार विभाग द्वारा भवन की सुरक्षा को लेकर तत्काल कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं?

स्थानीय स्तर पर मांग उठ रही है कि संबंधित विभाग द्वारा RES कार्यालय भवन का तत्काल तकनीकी निरीक्षण कराया जाए। भवन की वास्तविक स्थिति का आकलन कर जर्जर हिस्सों की मरम्मत कराई जाए और यदि भवन सुरक्षित नहीं है तो कर्मचारियों को किसी वैकल्पिक सुरक्षित भवन में स्थानांतरित किया जाए।

कर्मचारियों और आम लोगों की सुरक्षा को देखते हुए समय रहते कार्रवाई जरूरी है, ताकि किसी संभावित बड़े हादसे को टाला जा सके। 1982 में बने इस जर्जर भवन में आज भी सरकारी कामकाज जारी रहना अब जिम्मेदार अधिकारियों के लिए गंभीर चुनौती बन गया है।

प्रशांत गौतम

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