सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद बिलासपुर पहुंची CBI, DGP पर ‘Totally Incompetent’ टिप्पणी से मचा हड़कंप
कस्टोडियल डेथ मामले में ढाई साल की देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त—DGP और DG जेल को अवमानना में जेल भेजने की चेतावनी, जांच के घेरे में पुलिस और जेल प्रशासन
बिलासपुर/नई दिल्ली(छत्तीसगढ़ उजाला)-छत्तीसगढ़ में कस्टोडियल डेथ यानी हिरासत में मौत के एक मामले ने पुलिस मुख्यालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हलचल मचा दी है। सर्वोच्च अदालत की कड़ी नाराजगी और सख्त टिप्पणियों के बाद अब मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के हाथों में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद CBI की टीम बिलासपुर पहुंचकर मामले से जुड़े दस्तावेजों, पुलिस रिकॉर्ड और जेल से संबंधित साक्ष्यों को खंगाल रही है।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के DGP अरुण देव गौतम की कार्यप्रणाली पर बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए उन्हें “Totally Incompetent” यानी “पूरी तरह अक्षम” बताया। अदालत ने कस्टोडियल डेथ के मामले में FIR दर्ज करने में करीब ढाई साल की देरी और जांच से जुड़े तथ्यों को लेकर DGP से तीखे सवाल किए।
“क्या आपको ट्रेनिंग की जरूरत है?”—DGP से सुप्रीम कोर्ट का सीधा सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने DGP से सवाल किया कि कस्टोडियल डेथ के मामले में 2 साल 7 महीने बाद FIR दर्ज करने पर क्या उन्हें किसी ट्रेनिंग की जरूरत है?
अदालत ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट और दाखिल हलफनामे के बीच सामने आए विरोधाभास पर भी गंभीर आपत्ति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखे बिना कस्टोडियल डेथ के मामले में हलफनामा कैसे दाखिल कर दिया गया।
DGP की ओर से जवाब दिया गया कि रिपोर्ट केंद्रीय जेल, बिलासपुर भेजी गई थी और मामले में जांच के आदेश दिए गए हैं। दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
लेकिन अदालत ने इस जवाब पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि संबंधित जांच रिपोर्ट 22 जुलाई 2024 को ही जमा हो चुकी थी। इसके बाद अदालत ने सवाल किया कि रिपोर्ट जेल पहुंचने के बाद आखिर कहां चली गई? क्या उसे नष्ट किया गया या दबा दिया गया?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी इंगित किया कि यही रिपोर्ट हाईकोर्ट में DGP के हलफनामे के साथ दाखिल की गई थी। अदालत ने इसे कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश के तौर पर देखा।
DG जेल से भी कोर्ट ने पूछा—“रिपोर्ट पर बैठे रहे?”
सुनवाई के दौरान अदालत ने घटना और FIR के बीच लंबी देरी पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर करीब ढाई साल तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
अदालत ने DG जेल की भूमिका पर भी सवाल खड़ा किया और पूछा कि “और DG जेल क्या कर रहे थे? रिपोर्ट पर बैठे रहे?”
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के DGP की कार्यप्रणाली पर बेहद सख्त टिप्पणी की और कहा कि अदालत को यह दर्ज करना पड़ेगा कि राज्य के DGP “पूरी तरह अक्षम” हैं।
अदालत की सख्ती यहीं नहीं रुकी। DGP और DG जेल को अवमानना के मामले में कार्रवाई तथा जेल भेजे जाने की चेतावनी तक दी गई।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बिलासपुर पहुंची CBI
सर्वोच्च अदालत के निर्देश के बाद अब CBI ने मामले की जांच शुरू कर दी है। सूत्रों के मुताबिक, बिलासपुर पहुंची टीम ने मामले से जुड़े पुलिस अधिकारियों, जेल प्रशासन और घटना से संबंधित अन्य लोगों से जानकारी जुटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
जांच टीम द्वारा केंद्रीय जेल बिलासपुर से लेकर संबंधित पुलिस थाने तक के रिकॉर्ड और दस्तावेजों की पड़ताल किए जाने की जानकारी सामने आ रही है। पोस्टमार्टम से जुड़े रिकॉर्ड और घटना के दौरान मौजूद अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आने की संभावना है।
मामले से जुड़े तत्कालीन पुलिस और जेल अधिकारियों के साथ पोस्टमार्टम के दौरान मौजूद चिकित्सकों से भी जानकारी लिए जाने की बात सामने आई है।
क्या है श्रवण सूर्यवंशी की मौत का मामला?
मामला बिलासपुर के मोहरा क्षेत्र निवासी श्रवण सूर्यवंशी (34) की मौत से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, श्रवण को आबकारी एक्ट के मामले में सीपत थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया था।
बताया जाता है कि 19 जनवरी 2024 को उसे केंद्रीय जेल बिलासपुर में दाखिल कराया गया। जेल में उसकी तबीयत बिगड़ने के बाद 21 जनवरी 2024 को गंभीर हालत में सिम्स अस्पताल भेजा गया, जहां उसकी मौत हो गई।
इसके बाद मामले में जांच और FIR की प्रक्रिया को लेकर लंबे समय तक सवाल उठते रहे। पीड़ित परिवार ने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद मामला सर्वोच्च अदालत की निगरानी में पहुंच गया।
कस्टोडियल डेथ के आंकड़ों ने भी बढ़ाई चिंता
छत्तीसगढ़ में हिरासत में होने वाली मौतों को लेकर सामने आए आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक राज्य में 2021 में 71, 2022 में 90, 2023 में 57 और 2024 में 67 कस्टोडियल डेथ दर्ज की गईं।
इस तरह चार वर्षों में आंकड़ा 285 तक पहुंचता है। वहीं 2025 में 55 और 31 मार्च 2026 तक 14 हिरासत में मौतों की जानकारी सामने आने का दावा किया जा रहा है।
इन आंकड़ों ने पुलिस हिरासत और जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली के साथ-साथ ऐसी घटनाओं की जांच की निष्पक्षता और समयबद्धता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
जांच में लापरवाही या सिस्टम की बड़ी खामी?
कस्टोडियल डेथ के मामलों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस सिस्टम के अधिकारियों पर निष्पक्ष जांच की जिम्मेदारी है, अगर उसी स्तर पर जांच में देरी या लापरवाही के आरोप लगें तो पीड़ित परिवार को न्याय कैसे मिलेगा?
श्रवण सूर्यवंशी मामले में FIR में कथित लंबी देरी, जांच रिपोर्ट को लेकर उठे सवाल और सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
अब CBI जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि घटना के बाद किन अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की, जांच रिपोर्ट कहां रही, FIR में देरी क्यों हुई और क्या किसी स्तर पर जानबूझकर मामले को दबाने या कार्रवाई टालने का प्रयास किया गया।
DGP की कुर्सी पर भी उठने लगे सवाल
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद अब राज्य के DGP को पद पर बनाए रखने को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। चर्चा है कि यदि सर्वोच्च अदालत की निगरानी में किसी मामले में राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्ति दर्ज की गई है, तो उसी अधिकारी के पद पर बने रहने से जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल पैदा हो सकते हैं।
पीड़ित पक्ष और याचिकाकर्ता की ओर से संबंधित अधिकारियों को जांच से अलग करने तथा निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की मांग किए जाने की चर्चा है।
हालांकि, DGP को हटाने, CBI टीम के साथ पुलिस के असहयोग या अधिकारियों द्वारा जांच प्रभावित करने जैसे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों और राज्य सरकार का पक्ष सामने आना बाकी है।
DGP चयन प्रक्रिया पर भी उठने लगे सवाल
मामले से जुड़े सूत्रों के हवाले से DGP चयन प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आने की बात कही जा रही है। दावा है कि वरिष्ठता और पात्रता के बावजूद कुछ अधिकारियों को DGP पैनल से बाहर किए जाने तथा पसंदीदा अधिकारियों को पैनल में शामिल किए जाने के तथ्यों को भी अदालत के संज्ञान में लाने की तैयारी है।
हालांकि, ये आरोप अभी दावों और सूत्रों पर आधारित हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट की सख्त निगरानी और CBI जांच के बाद क्या इस पूरे मामले की परतें खुलेंगी?
CBI जांच से खुलेंगे कई राज?
बिलासपुर में CBI की सक्रियता के बाद पुलिस और जेल प्रशासन में हलचल तेज होने की खबर है। जांच टीम के सामने सबसे अहम सवाल होंगे—श्रवण सूर्यवंशी की मौत की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं? पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच रिपोर्ट के साथ क्या हुआ? FIR में इतनी देरी क्यों हुई? और क्या किसी अधिकारी की भूमिका या लापरवाही के कारण कार्रवाई टली?
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद अब यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की मौत तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल बन चुका है कि छत्तीसगढ़ में हिरासत में होने वाली मौतों की जांच कितनी स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध है।
CBI जांच आगे बढ़ने के साथ अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच एजेंसी किन अधिकारियों से पूछताछ करती है और क्या किसी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की दिशा में कदम बढ़ाया जाता है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की फटकार, CBI की बिलासपुर में एंट्री और DGP की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों ने छत्तीसगढ़ की पुलिसिंग व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है।



