*माहवारी स्वच्छता का बढ़ता बाजारवाद : काजल कसेर, समाज एवं पर्यावरण कार्यकर्ता, जांजगीर*
छत्तीसगढ़ उजाला

जांजगीर (छत्तीसगढ़ उजाला)। चाहे इतिहास के पन्नों को खोलकर देखा जाए या आधुनिक समाज का विश्लेषण किया जाए, समाजवाद, भौतिकवाद और बाजारवाद—तीनों के निशाने पर सबसे पहले महिलाएँ ही आती हैं। पहले गोरेपन की क्रीम जैसे उत्पादों के माध्यम से महिलाओं की बाहरी सुंदरता को प्रभावित करने की कोशिश की गई, लेकिन आज बाजारवाद महिलाओं के शरीर के भीतर तक पहुँच चुका है। माहवारी से जुड़े उत्पादों का बढ़ता व्यापार इसी का एक उदाहरण है, जहाँ प्राकृतिक प्रक्रिया को अस्वच्छ बताकर महंगे उत्पादों का बाजार खड़ा कर दिया गया है।
माहवारी को “अस्वच्छ” बताने की प्रवृत्ति
परंपरागत समाज ने मासिक धर्म को अक्सर अशुद्धि से जोड़ दिया, जिससे महिलाओं के साथ सामाजिक भेदभाव हुआ। लेकिन आधुनिकता भी इस मामले में पूरी तरह न्यायपूर्ण नहीं रही।
आधुनिक बाजार ने इसे “अस्वच्छ” बताकर महिलाओं को महंगे और रसायनयुक्त उत्पादों के उपयोग के लिए प्रेरित किया। हाइजीन के नाम पर सेनेटरी नैपकिन और टेंपोन का व्यापक प्रचार हुआ, जबकि यह भी सच है कि इनमें कई प्रकार के रसायन होते हैं, जो महिलाओं के स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए चिंता का विषय बनते जा रहे हैं।
पीरियड्स ब्लड : एक वैज्ञानिक दृष्टि
विज्ञान के अनुसार मासिक धर्म के दौरान निकलने वाला रक्त केवल अपशिष्ट नहीं होता। कई शोधों में पाया गया है कि इसमें ऐसी कोशिकाएँ और तत्व होते हैं जिनका उपयोग चिकित्सकीय अनुसंधान में भी किया जा रहा है। कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में यह भी उल्लेख मिलता है कि इसमें ऐसे सूक्ष्म तत्व होते हैं जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं।
पर्यावरण पर बढ़ता खतरा
पहले महिलाएँ सूती कपड़ों का उपयोग करती थीं, जो आसानी से विघटित हो जाते थे। लेकिन आजकल उपयोग होने वाले अधिकांश सेनेटरी पैड और टेंपोन प्लास्टिक व रसायनों से बने होते हैं, जिन्हें पूरी तरह नष्ट होने में 100 से 200 वर्ष तक का समय लग सकता है।
इन उत्पादों में पाए जाने वाले फ्थैलेट्स (Phthalates) और डाइऑक्सिन (Dioxins) जैसे रसायन शरीर में प्रवेश कर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उत्पन्न कर सकते हैं।
आज कई महिलाएँ अनियमित मासिक चक्र, हार्मोनल असंतुलन और अन्य समस्याओं से जूझ रही हैं, जिन पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।
माहवारी प्रबंधन : संवाद की जरूरत
माहवारी प्रबंधन एक अत्यंत संवेदनशील विषय है, लेकिन समाज में इस पर खुलकर चर्चा नहीं होती। परिणामस्वरूप कई महिलाएँ सही जानकारी से वंचित रह जाती हैं और बाजार के प्रभाव में ऐसे उत्पादों का उपयोग करती हैं जिनके बारे में उन्हें पूरी जानकारी नहीं होती।
केवल फेमिनिज्म नहीं, इको-फेमिनिज्म की जरूरत
महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए केवल आर्थिक और सामाजिक अधिकार ही पर्याप्त नहीं हैं।
आज आवश्यकता है इको-फेमिनिज्म की—जहाँ महिला और प्रकृति के संबंध को समझते हुए जीवनशैली अपनाई जाए।
महिलाओं को चाहिए कि वे प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों जैसे बायोडिग्रेडेबल पैड या सूती कपड़ों से बने नैपकिन का उपयोग करें। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण होगा बल्कि स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी कम होंगे।
निष्कर्ष
माहवारी कोई अभिशाप नहीं, बल्कि स्त्री शरीर की एक स्वाभाविक और शक्तिशाली प्रक्रिया है। महिलाओं को चाहिए कि वे सामाजिक रूढ़ियों और बाजारवाद दोनों से सावधान रहते हुए अपने शरीर को समझें, स्वच्छता और स्वास्थ्य का ध्यान रखें तथा प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने का प्रयास करें। क्योंकि यह केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि स्त्री शक्ति का जीवंत प्रमाण है।



