गौरेला-पेंड्रा-मरवाही टेंडर घोटाला: हितेश सूर्यवानी पर फर्जी दस्तावेज के आरोप, ‘सेटिंग’ की चर्चा और सवालों से बचते जिम्मेदार अधिकारी!

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही(छत्तीसगढ़ उजाला)-जिले में 3 करोड़ 1 लाख 32 हजार रुपये के जिला पंचायत निर्माण कार्य से जुड़ा कथित टेंडर घोटाला अब और गंभीर हो गया है। शिकायतकर्ता फर्म श्री जी कंस्ट्रक्शन ने ठेकेदार हितेश सूर्यवानी पर आरोप लगाया है कि उन्होंने फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र और पूर्णता प्रमाण पत्र लगाकर करोड़ों का टेंडर हासिल किया।
हालांकि इन आरोपों की अभी तक किसी सक्षम जांच एजेंसी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
फर्जी अनुभव के सहारे करोड़ों का टेंडर?
शिकायत के अनुसार, जिस निर्माण कार्य का वास्तविक अनुभव और पूर्णता प्रमाण पत्र श्री जी कंस्ट्रक्शन ने वैध रूप से प्रस्तुत किया था, उसी कार्य से संबंधित कथित कूटरचित दस्तावेज हितेश सूर्यवानी द्वारा निविदा में लगाए गए।
यदि दो अलग-अलग फर्म एक ही कार्य का अनुभव दिखा रही थीं, तो जांच समिति ने उस समय आपत्ति क्यों नहीं उठाई?
क्या दस्तावेजों की गहन जांच हुई थी या सिर्फ औपचारिकता निभाई गई?
जांच समिति और अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
निविदा प्रक्रिया के बाद दस्तावेजों का निरीक्षण जांच समिति द्वारा किया जाता है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि—
• क्या फर्जी हस्ताक्षर और बिना जावक क्रमांक वाले प्रमाण पत्र जांच में नजर नहीं आए?
• या फिर जानबूझकर अनदेखी की गई?
यदि लापरवाही हुई है, तो यह गंभीर प्रशासनिक विफलता है।
और यदि जानबूझकर अनदेखी हुई है, तो यह संभावित मिलीभगत का संकेत हो सकता है।
मीडिया से बचते अधिकारी, गहराता शक
ग्रामीण यांत्रिकी सेवा संभाग मरवाही के कार्यपालन अभियंता (ईई) का रवैया भी चर्चा में है। फोन पर कार्यालय में न होने की बात कहना और बाद में कार्यालय में मौजूद पाए जाना कई सवाल खड़े करता है।
तत्काल बयान देने से इनकार और समय मांगना— क्या यह सामान्य प्रक्रिया है या जवाबदेही से बचने की कोशिश?
‘सेटिंग’ की चर्चा – मामला दबाने की कोशिश?
विभागीय सूत्रों का दावा है कि शिकायत सामने आने के बाद कुछ स्तरों पर मामले को “मैनेज” करने की कोशिश की जा रही है ताकि संभावित आपराधिक कार्रवाई से बचा जा सके। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस तरह की चर्चाओं ने संदेह को और गहरा कर दिया है।
क्या फर्जीवाड़े को दबाने के लिए पर्दे के पीछे समझौते की कोशिश हो रही है?
क्या आपराधिक मामला दर्ज होने से पहले ही सब कुछ शांत कराने की रणनीति बन रही है?
मामला सिर्फ एक ठेकेदार का नहीं, पूरी व्यवस्था का है
यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ एक टेंडर विवाद नहीं बल्कि सरकारी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल होगा।
फिलहाल आरोप गंभीर हैं, जांच जारी है और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है।
अब नजर इस बात पर है कि—
क्या निष्पक्ष जांच होगी और सच्चाई सामने आएगी?
या फिर यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा?



