राजनैतिक रूप से VVIP जिले कबीरधाम की 21वीं कलेक्टर बनीं तूलिका प्रजापति, अब विकास की रुकी रफ्तार को फिर पटरी पर लाने की चुनौती
कवर्धा(छत्तीसगढ़ उजाला)-पूर्ण रूप से कृषि आधारित और राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण जिला कबीरधाम गठन के बाद से लगातार विकास की राह पर आगे बढ़ता रहा है। जिले के विकास को गति देने में यहां के जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ अलग-अलग समय में पदस्थ रहे कलेक्टरों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। हालांकि, दो दशक से अधिक के प्रशासनिक सफर में कुछ कलेक्टर ही ऐसे रहे, जिन्होंने अपने काम और प्रशासनिक शैली से आम लोगों के दिलों में स्थायी जगह बनाई।
कबीरधाम में अब तक 20 कलेक्टरों की पदस्थापना हो चुकी है और 21वें कलेक्टर के रूप में श्रीमती तूलिका प्रजापति ने जिले की कमान संभाली है। उनके सामने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत रखने की चुनौती है, बल्कि पूर्व कलेक्टरों की विकास और सुशासन की उस परंपरा को आगे बढ़ाने की भी जिम्मेदारी है, जिसकी चर्चा आज भी जिले में होती है।
जिले के प्रथम कलेक्टर के रूप में एसडी अग्रवाल का नाम दर्ज है। इसके बाद डॉ. एम.वी. सुब्बारेड्डी, एस.के. तिवारी, सोनमणी बोरा, मुकेश बंसल, नीरज बंसोड़, आर. संगीता, पी. दयानंद, अवनीश शरण, रमेश शर्मा, जन्मेजय महोबे और गोपाल वर्मा जैसे कलेक्टरों के कार्यकाल आज भी लोगों की चर्चा का हिस्सा हैं।
सुब्बारेड्डी ने रखी विकास की मजबूत नींव
डॉ. एम.वी. सुब्बारेड्डी को भोरमदेव सहकारी शक्कर कारखाने को महज 11 माह के अल्प समय में प्रारंभ कराने के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है। उनके कार्यकाल में सुतियापाट सिंचाई परियोजना, नए कलेक्टर कार्यालय भवन, भोरमदेव से बंजारी पालक मार्ग, बोडला-दलदली सड़क तथा कलेक्टर और एसपी बंगले जैसे महत्वपूर्ण निर्माण कार्य हुए।
इन परियोजनाओं ने जिले के शुरुआती विकास की आधारशिला मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सोनमणी बोरा ने बदली कवर्धा शहर की तस्वीर
इसके बाद सोनमणी बोरा को एक ऊर्जावान और युवा कलेक्टर के रूप में याद किया जाता है। उनके कार्यकाल में कवर्धा शहर के विकास को नई दिशा मिली। सड़कों का चौड़ीकरण, डिवाइडरयुक्त सड़कें, हाईमास्ट लाइट, तालाबों का सौंदर्यीकरण, ऊर्जा पार्क, अटल उद्यान, गांधी मैदान और सरदार वल्लभभाई पटेल मैदान की बाउंड्रीवाल, जिला अस्पताल, नया जिला पंचायत भवन, महिला कॉलेज, भोरमदेव मंदिर परिसर का विकास, लक्ष्मण झूला और सरोदा बांध क्षेत्र में विकास कार्यों ने कवर्धा को एक नए स्वरूप में पहुंचाया।
सोनमणी बोरा के कार्यकाल में 11 घंटे में 37 लाख से अधिक पौधे लगाने का रिकॉर्ड भी चर्चा में रहा, जिससे कबीरधाम का नाम राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया।
हालांकि, समय के साथ कई पुराने विकास कार्यों के रखरखाव की कमी भी सामने आई। बावजूद इसके, शहर के स्वरूप में व्यापक बदलाव लाने वाले कलेक्टरों में सोनमणी बोरा का नाम आज भी प्रमुखता से लिया जाता है।
परदेशी और दयानंद के कार्यकाल में चुनाव प्रबंधन की चर्चा
सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी और पी. दयानंद के कार्यकाल को जिले में चुनाव प्रबंधन के लिए याद किया जाता है। विधानसभा, लोकसभा, त्रिस्तरीय पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों को व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने में प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
परदेशी के कार्यकाल में कवर्धा के बूढ़ा महादेव मंदिर से भोरमदेव मंदिर तक पदयात्रा की शुरुआत हुई। आगे चलकर यह आयोजन जिले की धार्मिक और पर्यटन पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
भोरमदेव सहकारी शक्कर कारखाने के पहली बार लाभ में आने और शेयरधारकों तथा गन्ना उत्पादक किसानों को बोनस वितरण की शुरुआत को भी उनके कार्यकाल से जोड़कर देखा जाता है।
मुकेश बंसल ने गांवों को बनाया विकास का केंद्र
जिले के 11वें कलेक्टर मुकेश बंसल ने प्रशासनिक कार्यशैली से अलग पहचान बनाई। उनका जोर शहरों के साथ-साथ गांवों के विकास पर रहा। रेंगाखार जैसे बैगा बाहुल्य क्षेत्र में गार्डन, बस स्टैंड, आश्रम, बाजार, खाद्य गोदाम, चौक और सीसी रोड जैसे कार्यों से गांव का स्वरूप बदलने का प्रयास हुआ।
दलदली सहित पोंडी, बोडला, सहसपुर-लोहारा, पांडातराई, पंडरिया, मोहगांव, कुकदूर, झलमला, पिपरिया, दामापुर, कुंडा और कुई जैसे क्षेत्रों में भी विकास कार्यों को गति मिली।
आईएपी राशि से जुड़े निर्माण कार्यों को समय से पहले पूरा कराने के मामले में कबीरधाम को देश में अग्रणी स्थान दिलाने का दावा भी उनके कार्यकाल से जुड़ा रहा। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी उनके कार्यकाल को महत्वपूर्ण माना जाता है।
पहली महिला कलेक्टर आर. संगीता की कड़क छवि
कबीरधाम की पहली महिला कलेक्टर श्रीमती आर. संगीता अपनी कड़क प्रशासनिक छवि और राजनीतिक दबावों से परे रहकर काम करने के लिए जानी गईं। उनके कार्यकाल में प्रशासनिक सख्ती और निर्णय क्षमता की चर्चा रही।
इसके बाद पी. दयानंद ने जिले के प्रशासनिक नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली। उनके कार्यकाल में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के विभिन्न कार्यक्रमों में प्रशासनिक व्यवस्थाओं और बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी की चर्चा हुई।
धनंजय देवांगन के कार्यकाल में स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों चुनौती
धनंजय देवांगन के कार्यकाल में स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए। एक ओर नवजात शिशुओं की मौत का गंभीर मामला स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े करता रहा, वहीं दूसरी ओर मिशन-75 जैसे अभियान के जरिए शिक्षा व्यवस्था में सुधार की कोशिश की गई।
युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने और कौशल उन्नयन के लिए भी प्रयास किए गए। उनके सहज व्यवहार के कारण ग्रामीणों के बीच उनकी अलग पहचान बनी।
नीरज बंसोड़ की तेज विकास की उम्मीद, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप की चर्चा
इसके बाद सुकमा जैसे नक्सल प्रभावित जिले में अपनी प्रशासनिक पहचान बना चुके नीरज कुमार बंसोड़ ने कबीरधाम की कमान संभाली। उनसे जिले के विकास को तेज रफ्तार मिलने की उम्मीद थी।
शहर में सड़क चौड़ीकरण की महत्वाकांक्षी योजना को लेकर ऋषभदेव चौक तक पहुंचने के बाद कथित राजनीतिक और प्रभावशाली हस्तक्षेप की चर्चा हुई। विकास की योजना को अपेक्षित गति नहीं मिलने से निराशा का माहौल बना और बंसोड़ का कार्यकाल करीब छह माह में ही समाप्त हो गया।
अवनीश शरण ने स्वास्थ्य और शिक्षा पर दिया जोर
अवनीश शरण के कार्यकाल में स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में कई नए प्रयोग हुए। वनांचल क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के लिए बाइक एंबुलेंस की पहल की गई।
शिक्षक विहीन स्कूलों में शिक्षा की व्यवस्था के साथ रोजगार का अवसर पैदा करने के उद्देश्य से संरक्षित बैगा और आदिवासी समुदाय के शिक्षित युवाओं को शाला संगवारी के रूप में जोड़ने की पहल चर्चा में रही।
कोरोना महामारी के पहले चरण में संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए जिला प्रशासन की रणनीति और प्रबंधन को भी महत्वपूर्ण माना गया।
रमेश शर्मा के सहज व्यवहार और संकट प्रबंधन की चर्चा
महामारी की दूसरी लहर के दौरान रमेश शर्मा ने जिले की कमान संभाली। उनके सहज और सरल व्यवहार ने आम लोगों के बीच सकारात्मक छवि बनाई।
कोरोना मरीजों के बेहतर उपचार के लिए निजी अस्पतालों के साथ समन्वय, नजूल से जुड़ी वर्षों पुरानी फाइलों के निराकरण, आदिवासियों की जमीनों से संबंधित मामलों में अनुमति तथा झंडा कांड के बाद बने तनावपूर्ण माहौल को नियंत्रित करने में प्रशासनिक प्रबंधन उनके कार्यकाल की प्रमुख विशेषताओं में रहा।
जन्मेजय महोबे ने बैगा क्षेत्रों में पोषण पर दिया जोर
जन्मेजय महोबे के कार्यकाल में विशेष पिछड़ी जनजातियों, खासकर बैगा समुदाय के बच्चों और महिलाओं के पोषण एवं स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी गई। स्थानीय बोली-भाषा में “पुट बारो सेढ़ी बढ़न” जैसे अभिनव अभियान के जरिए जनजातीय क्षेत्रों तक पोषण जागरूकता पहुंचाने का प्रयास किया गया।
उनके कार्यकाल में विधानसभा और लोकसभा चुनाव भी सफलतापूर्वक संपन्न हुए। स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण निर्वाचन व्यवस्था बनाए रखने में प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
गोपाल वर्मा के कार्यकाल में मेडिकल कॉलेज और बस स्टैंड बना चर्चा का केंद्र
20वें कलेक्टर गोपाल वर्मा के कार्यकाल में कबीरधाम कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी बना। लोहारिडीह और कामठी जैसे संवेदनशील मामलों में प्रशासनिक भूमिका के साथ-साथ मेडिकल कॉलेज की सौगात और भूमिपूजन जिले के लिए बड़ी उपलब्धि के रूप में सामने आया।
करीब एक दशक से नए बस स्टैंड में बसों की शिफ्टिंग का इंतजार भी उनके कार्यकाल में पूरा हुआ। इसके चलते गोपाल वर्मा को इन प्रमुख कार्यों के लिए विशेष रूप से याद किया जा सकता है।
अब 21वीं कलेक्टर तूलिका प्रजापति के सामने बड़ी चुनौती
अब राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण माने जाने वाले कबीरधाम जिले की 21वीं कलेक्टर के रूप में श्रीमती तूलिका प्रजापति ने पदभार संभाला है।
उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती पूर्व कलेक्टरों द्वारा स्थापित विकास और सुशासन की परंपरा को आगे बढ़ाने की होगी। वर्षों से लंबित राजस्व और नजूल प्रकरण, आदिवासियों की जमीनों से जुड़ी अनुमति, अवैध खनन, अतिक्रमण, भू-माफिया और अन्य प्रशासनिक समस्याएं उनकी कार्यशैली की बड़ी परीक्षा होंगी।
इसके अलावा जिले में सामाजिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना भी प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण चुनौती रहेगी। कामठी, लोहारिडीह, झंडा विवाद, धरमपुरा और हरमो जैसे मामलों के बाद जिले में शांति और सामाजिक समरसता बनाए रखना प्रशासन की प्राथमिकता में रहना होगा।
कबीरधाम पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह तथा उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा का गृह जिला है। वहीं पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की राजनीतिक गतिविधियों के कारण भी यह जिला लंबे समय से प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रहा है। ऐसे में प्रशासनिक निष्पक्षता के साथ राजनीतिक संतुलन बनाए रखना भी नई कलेक्टर के लिए कम चुनौतीपूर्ण नहीं होगा।
जनता को अब फिर विकास की रफ्तार की उम्मीद
कबीरधाम के प्रशासनिक इतिहास को देखें तो हर कलेक्टर अपने साथ काम करने की एक अलग शैली और कुछ विशिष्ट उपलब्धियां छोड़कर गया है। कोई शहर के विकास के लिए याद किया गया, किसी ने गांवों का कायाकल्प किया, किसी ने शिक्षा-स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी तो किसी ने संकट के समय प्रशासनिक क्षमता दिखाई।
अब नजरें तूलिका प्रजापति पर हैं कि वे कबीरधाम के विकास को किस दिशा में ले जाती हैं।
जनता की अपेक्षा है कि प्रशासनिक सेवाएं सरल, सहज और पारदर्शी हों, लंबित मामलों का समयबद्ध निराकरण हो, शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था मजबूत हो, कुपोषण की समस्या पर प्रभावी काम हो और युवाओं तथा जरूरतमंद परिवारों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ें।
सबसे अहम यह होगा कि शासन की योजनाओं का लाभ जिले के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और आम नागरिक के मन में यह भरोसा मजबूत हो कि “यह सरकार मेरी है और शासन-प्रशासन मेरे साथ खड़ा है।”
कबीरधाम में विकास की जो रफ्तार कभी कई कलेक्टरों के कार्यकाल में देखने को मिली, क्या तूलिका प्रजापति उस गति को फिर से हासिल कर पाएंगी—अब जिले की जनता की निगाहें इसी पर टिकी हैं
बात बेबाक
चंद्रशेखर शर्मा(पत्रकार)




