छत्तीसगढ़ में अडानी को दो और कोल माइंस की स्टेज-1 मंजूरी, रायगढ़ के 983 हेक्टेयर जंगलों में खनन का रास्ता हुआ साफ
रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-छत्तीसगढ़ में अडानी समूह की कोयला परियोजनाओं को लेकर एक और बड़ा फैसला सामने आया है। केंद्र सरकार ने रायगढ़ जिले में दो कोयला खनन परियोजनाओं के लिए करीब 983.44 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन (गैर-वन उपयोग) को सैद्धांतिक (स्टेज-1) मंजूरी दे दी है। इन परियोजनाओं का संबंध अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड के लिए प्रस्तावित कोयला खनन से है।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee) ने यह मंजूरी दी है। हालांकि यह केवल स्टेज-1 स्वीकृति है। इसका अर्थ है कि अभी खनन शुरू नहीं होगा। परियोजनाओं को निर्धारित सभी शर्तें पूरी करने के बाद ही अंतिम यानी स्टेज-2 मंजूरी मिलेगी, जिसके बाद राज्य सरकार अंतिम आदेश जारी करेगी।
रायगढ़ में दो बड़ी कोयला परियोजनाओं को मंजूरी
समिति ने रायगढ़ जिले में कुल 983.44 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को मंजूरी दी है।
1. पुरुंगा भूमिगत कोयला ब्लॉक
वन भूमि: 621.331 हेक्टेयर
परियोजना: अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड
प्रस्तावित पेड़ों की कटाई: 4,368
राज्य सरकार की रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र में एशियाई हाथी, भारतीय पैंगोलिन, स्लॉथ भालू और भारतीय लोमड़ी जैसे वन्यजीवों की मौजूदगी और आवाजाही दर्ज की गई है। इसी को देखते हुए समिति ने लगभग 14.81 करोड़ रुपये की वन्यजीव प्रबंधन योजना को भी मंजूरी दी है।
2. पेलमा ओपन कास्ट कोयला खदान
कुल खनन पट्टा क्षेत्र: 2,077.935 हेक्टेयर
वन भूमि: 362.109 हेक्टेयर
प्रस्तावित पेड़ों की कटाई: 52,570
वन विभाग के अनुसार इस इलाके में भी हाथियों की नियमित आवाजाही होती है। हालांकि इसे अभी तक आधिकारिक हाथी गलियारा (Elephant Corridor) घोषित नहीं किया गया है।
जंगल और आजीविका पर बढ़ी चिंता
रायगढ़ के ग्रामीणों का कहना है कि जंगल उनके लिए केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि रोजगार, जल स्रोत और जीवन का आधार हैं। महुआ, तेंदूपत्ता समेत अन्य लघु वनोपज से हजारों परिवारों की आजीविका चलती है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि खनन का दायरा बढ़ता है तो जंगल सिमटेंगे, वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास प्रभावित होगा और पारंपरिक आजीविका पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।
ओडिशा की अलकनंदा परियोजना भी चर्चा में
वन सलाहकार समिति ने ओडिशा की अलकनंदा कोल माइंस परियोजना को भी सैद्धांतिक मंजूरी दी है। विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना पर्यावरणीय दृष्टि से सबसे अधिक प्रभाव डालने वाली परियोजनाओं में शामिल है।
अनुमान है कि इस परियोजना में 3.30 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई करनी पड़ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे बड़े वन क्षेत्र प्रभावित होंगे और वन-आश्रित तथा आदिवासी समुदायों के विस्थापन की आशंका बढ़ सकती है।
इसके अलावा समिति ने टाटा स्टील की गंधालपाड़ा लौह अयस्क परियोजना को भी सैद्धांतिक मंजूरी दी है। कंपनी को ओडिशा के क्योंझर जिले में 216.875 हेक्टेयर भूमि लीज पर देने की सिफारिश की गई है। हालांकि स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि अंतिम मंजूरी मिलने से पहले किसी भी प्रकार का भूमि डायवर्जन या खनन कार्य शुरू नहीं किया जाएगा।
वन (संरक्षण) अधिनियम के तहत किसी भी विकास परियोजना के लिए वन भूमि के डायवर्जन की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है।
स्टेज-1: सैद्धांतिक मंजूरी।
परियोजना को निर्धारित सभी शर्तों का पालन करना होता है।इसके बाद स्टेज-2 (अंतिम केंद्रीय मंजूरी) दी जाती है।अंतिम आदेश संबंधित राज्य सरकार जारी करती है।इसके बाद ही खनन कार्य शुरू किया जा सकता है।
हसदेव अरण्य का मामला भी सुर्खियों में
गौरतलब है कि जून 2026 में केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य स्थित केते एक्सटेंशन इंटीग्रेटेड कोयला ब्लॉक को भी पर्यावरणीय मंजूरी दी थी।
इस परियोजना के लिए 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन और 4.48 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव है। सरकार ने निर्देश दिया है कि पेड़ों की कटाई चरणबद्ध तरीके से की जाए तथा 67 हजार से अधिक छोटे पेड़ों का प्रत्यारोपण सुनिश्चित किया जाए।
प्रमुख बातें
रायगढ़ में 983.44 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को स्टेज-1 मंजूरी।
पुरुंगा और पेलमा कोयला परियोजनाओं को मिली सैद्धांतिक स्वीकृति।
दोनों परियोजनाओं में कुल 56,938 पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव।
हाथियों समेत कई वन्यजीवों की मौजूदगी के चलते वन्यजीव प्रबंधन योजना लागू होगी।
अंतिम मंजूरी मिलने के बाद ही खनन कार्य शुरू हो सकेगा।



