पहली बारिश में डूब गया 1080 करोड़ का ‘स्मार्ट’ बिलासपुर! शहर बेहाल, कमिश्नर का बंगला बचाने में जुटा पूरा निगम, उठे करोड़ों के हिसाब पर सवाल
सड़कें बनीं नदी, घरों में घुसा पानी, ट्रांसफार्मर डूबे… लेकिन प्रशासन की सबसे बड़ी चिंता बना वीआईपी बंगला; स्मार्ट सिटी, सफाई व्यवस्था और करोड़ों के खर्च पर जनता ने मांगा जवाब।
बिलासपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-पहली ही मूसलाधार बारिश ने बिलासपुर स्मार्ट सिटी की चमकदार तस्वीर को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। जिस शहर को 1080 करोड़ रुपये की परियोजना के जरिए आधुनिक ड्रेनेज, विश्वस्तरीय जल निकासी और बेहतर शहरी सुविधाओं का मॉडल बताया गया था, वही शहर कुछ घंटों की बारिश में पानी-पानी हो गया। सड़कें नदियों में तब्दील हो गईं, निचले इलाकों में घरों तक पानी घुस गया, कई कॉलोनियां जलमग्न हो गईं और जगह-जगह ट्रांसफार्मर पानी से घिर जाने के कारण लोगों में करंट का भय बना रहा।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा जिस तस्वीर की हुई, वह शहर के जलभराव की नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्राथमिकताओं की थी। जब हजारों लोग अपने घरों से बाल्टी, डिब्बों और मोटर पंपों से पानी निकालने के लिए जूझ रहे थे, तब नगर निगम का पूरा अमला नगर निगम कमिश्नर प्रकाश सर्वे के सरकारी बंगले से पानी निकालने में जुटा दिखाई दिया।
बताया गया कि कमिश्नर के सरकारी आवास पर जलभराव होते ही हाई हॉर्स पावर पंप, भारी मोटर, ट्रक और नगर निगम के अन्य संसाधन तत्काल मौके पर पहुंचा दिए गए। सफाई व्यवस्था के प्रभारी एवं जोन कमिश्नर प्रवेश कश्यप स्वयं छाता लेकर मौके पर डटे रहे और पूरे ऑपरेशन की निगरानी करते रहे।
सवाल यह नहीं है कि सरकारी आवास से पानी क्यों निकाला गया। सवाल यह है कि जब पूरा शहर जलभराव की चपेट में था, तब प्रशासन की सबसे बड़ी प्राथमिकता आखिर एक वीआईपी आवास ही क्यों बन गई? जिन वार्डों में लोग घंटों मदद का इंतजार करते रहे, वहां ऐसी तत्परता क्यों दिखाई नहीं दी?
हर महीने 4 करोड़ सफाई पर खर्च, फिर भी पहली बारिश में बैठ गया सिस्टम
विडंबना यह है कि नगर निगम हर महीने करीब 4 करोड़ रुपये सफाई व्यवस्था पर खर्च करने का दावा करता है। मुख्य सड़कों और गलियों की सफाई का जिम्मा लायंस कंपनी के पास है, जबकि नालियों की सफाई और कचरा प्रबंधन रामकी कंपनी को सौंपा गया है।
करोड़ों रुपये के नियमित भुगतान के बावजूद पहली ही तेज बारिश में नालियां उफन गईं, सड़कें तालाब बन गईं और जल निकासी व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त नजर आई। इससे साफ संकेत मिला कि या तो नालों की सफाई केवल कागजों में हुई या फिर पूरे सिस्टम की निगरानी गंभीर रूप से विफल रही।
जब कमिश्नर का बंगला ही नहीं बचा, तो जनता कैसे सुरक्षित?
अब सबसे बड़ा सवाल उन अधिकारियों पर है जिनके जिम्मे पूरे शहर की सफाई, नालों की निगरानी और जल निकासी व्यवस्था है।
यदि मानसून पूर्व नाला सफाई अभियान वास्तव में सफल था तो पहली ही बारिश में पूरा सिस्टम क्यों धराशायी हो गया?
यदि करोड़ों रुपये सही तरीके से खर्च हुए, तो कमिश्नर का सरकारी आवास तक जलभराव से क्यों नहीं बच पाया?
जब प्रशासन का अपना सरकारी परिसर ही सुरक्षित नहीं रह सका, तो आम नागरिकों की सुरक्षा और बेहतर व्यवस्था के दावे किस आधार पर किए जा रहे हैं?
कागजों में तैयारी, जमीन पर तबाही
हर साल मानसून से पहले नाला सफाई, गाद निकासी और जल निकासी व्यवस्था दुरुस्त करने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन पहली ही बारिश ने इन सभी दावों की पोल खोल दी।
शहर के अधिकांश हिस्सों में नालियां कचरे से अटी मिलीं, पानी सड़कों पर बहता रहा, कई इलाकों में घंटों जलभराव बना रहा और यातायात पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। जिन परियोजनाओं को भविष्य की स्मार्ट व्यवस्था बताया गया था, वे पहली ही परीक्षा में फेल साबित होती नजर आईं।
1080 करोड़ की स्मार्ट सिटी… लेकिन स्मार्ट ड्रेनेज कहां?
वर्षों तक चली 1080 करोड़ रुपये की स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत आधुनिक ड्रेनेज, बेहतर जल निकासी और विश्वस्तरीय शहरी सुविधाओं के दावे किए गए थे। लेकिन पहली ही बारिश ने इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
जनता पूछ रही है कि आखिर वह स्मार्ट ड्रेनेज सिस्टम कहां है? करोड़ों रुपये से बनाई गई आधुनिक जल निकासी परियोजनाएं कहां हैं? यदि हर मानसून में शहर इसी तरह डूबना है, तो फिर स्मार्ट सिटी का दर्जा आखिर किस काम का?
अब जवाबदेही तय करने की मांग
यह मामला अब केवल जलभराव तक सीमित नहीं है। यह करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, ठेकेदार एजेंसियों की जवाबदेही और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन चुका है।
जिन एजेंसियों को सफाई और नाला प्रबंधन का जिम्मा दिया गया, उनके कार्यों का मूल्यांकन कैसे हुआ? क्या कभी स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया गया? यदि सब कुछ संतोषजनक था, तो हर बारिश में शहर डूब क्यों रहा है?
जनता को तस्वीरें नहीं, जवाब चाहिए
बिलासपुर की जनता अब केवल आश्वासन नहीं, जवाब चाहती है। वह जानना चाहती है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हर मानसून में वही संकट क्यों दोहराया जाता है। वह यह भी पूछ रही है कि आपदा की घड़ी में प्रशासन की पहली जिम्मेदारी पूरे शहर की होती है या केवल वीआईपी आवासों की।
पहली ही बारिश ने 1080 करोड़ की स्मार्ट सिटी परियोजना, सफाई व्यवस्था और प्रशासनिक दावों की हकीकत सबके सामने ला दी है। अब वक्त नई घोषणाओं का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। यदि इस विफलता पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो हर मानसून यही सवाल गूंजेगा—क्या बिलासपुर वास्तव में स्मार्ट सिटी है, या सिर्फ कागजों पर बनाई गई एक महंगी परिकल्पना?



