गौरेला पेंड्रा मरवाहीछत्तीसगढ

मरवाही में शराब दुकान शिफ्टिंग पर बवाल: बिना डायवर्शन जमीन पर मंजूरी? शासकीय कर्मचारी को फायदा पहुंचाने के आरोप, जांच की मांग तेज

मरवाही (जिला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, छत्तीसगढ़)।
नगर पंचायत मरवाही में प्रस्तावित शासकीय शराब दुकान के नए भवन में शिफ्टिंग का मामला अब गंभीर विवाद का रूप ले चुका है। जहां पहले स्थानीय लोगों ने स्कूल और रिहायशी इलाके के पास दुकान खोलने का विरोध किया था, वहीं अब पूरे प्रकरण में नियमों की अनदेखी, पक्षपात और राजनीतिक संरक्षण के आरोप खुलकर सामने आ रहे हैं।
आवेदनकर्ता द्वारा कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन में सीधा आरोप लगाया गया है कि जिस भवन का चयन शराब दुकान के लिए किया गया है, उसके स्वामी सतीश तिवारी एक शासकीय कर्मचारी हैं। नियमों के अनुसार ऐसे मामलों में शासकीय कर्मचारियों की भागीदारी पर सख्त शर्तें लागू होती हैं, इसके बावजूद उनका नाम पात्र सूची में शामिल होना कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
जमीन को लेकर सबसे बड़ा विवाद
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू भूमि से जुड़ा है। आरोप है कि खसरा नंबर 12/1, जो सतीश तिवारी के नाम पर दर्ज है, अब तक कृषि भूमि से व्यावसायिक उपयोग में परिवर्तित (डायवर्ट) नहीं हुआ है। ऐसे में बिना डायवर्शन के उसी जमीन पर शराब दुकान के लिए भवन चयनित और स्वीकृत किया जाना सीधे-सीधे नियमों का उल्लंघन माना जा रहा है।
निविदा प्रक्रिया पर उठे सवाल
आवेदनकर्ता ने निविदा प्रक्रिया को भी कठघरे में खड़ा किया है। उनका आरोप है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही और राजनीतिक दबाव में एक खास व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को दरकिनार किया गया। इससे प्रशासनिक स्तर पर मिलीभगत की आशंका भी जताई जा रही है।
स्थानीय विरोध और बढ़ता जनआक्रोश
प्रस्तावित स्थल घनी आबादी, स्कूल और व्यावसायिक गतिविधियों के बीच स्थित है, जिससे सामाजिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं। स्थानीय लोग पहले से ही इस फैसले का विरोध कर रहे थे, लेकिन अब अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बाद विरोध और तेज हो गया है।
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
अब यह पूरा मामला प्रशासन के लिए अग्निपरीक्षा बन गया है। एक ओर जनता का दबाव और सामाजिक सरोकार हैं, तो दूसरी ओर नियमों की अनदेखी के गंभीर आरोप। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह विवाद बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक संकट में बदल सकता है।
फिलहाल सबकी नजर प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी है—क्या होगी निष्पक्ष जांच या फिर आरोपों का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा?

प्रशांत गौतम

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