“रेंजर–डिप्टी रेंजर पर संरक्षण और लेन-देन के आरोप! रातभर अवैध लकड़ी का परिवहन , नाम सुनते ही ‘जाने दो’ का फरमान—पेंड्रा वन परिक्षेत्र में बड़ा खेल उजागर”

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही(छत्तीसगढ़ उजाला)-जिले के पेंड्रा वन परिक्षेत्र से लकड़ी तस्करी को लेकर चौंकाने वाले आरोप सामने आए हैं, जिन्होंने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि जिन कंधों पर जंगलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वही अधिकारी कथित तौर पर तस्करों को संरक्षण दे रहे हैं, जिसके चलते अवैध कटाई बेखौफ जारी है।
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, तस्करों की गतिविधियां देर रात से लेकर सुबह 4 बजे तक चरम पर रहती हैं। इस पूरे नेटवर्क को कथित तौर पर डिप्टी रेंजर प्रकाश बंजारे द्वारा संचालित किए जाने की बात कही जा रही है। हैरानी की बात यह है कि वन संपदा की रक्षा करने वाले ही अब संदेह के घेरे में हैं।
“मोनू महराज” बना तस्करी का पासवर्ड!
इस पूरे मामले में “मोनू महराज” नाम एक ऐसे कथित नेटवर्क के रूप में उभरकर सामने आया है, जिसका नाम लेते ही कार्रवाई ठप हो जाती है। सूत्रों का दावा है कि जब भी लकड़ी से भरे वाहनों को रोका जाता है, तो पहला सवाल होता है—“किसका वाहन है?”
और जैसे ही जवाब मिलता है—“मोनू महराज”, कथित तौर पर अधिकारियों द्वारा कार्रवाई रोकने के निर्देश दे दिए जाते हैं। यही कारण है कि क्षेत्र में बड़ी जब्ती कार्रवाई लगभग न के बराबर नजर आ रही है।
रेंजर खुटे और बंजारे की भूमिका पर सवाल
वन विभाग के रेंजर ईश्वरी खुटे और डिप्टी रेंजर प्रकाश बंजारे की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकारियों की कथित ‘सेटिंग’ के चलते तस्करों को खुली छूट मिल रही है। जंगलों से कीमती लकड़ी की अंधाधुंध कटाई जारी है, लेकिन कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित दिख रही है।
आरा मिलों तक सीधा सप्लाई
सूत्रों के अनुसार, अवैध रूप से काटी गई लकड़ी सीधे आरा मिलों तक पहुंचाई जा रही है। इस पूरे नेटवर्क में स्थानीय स्तर पर मजबूत तालमेल होने की बात सामने आ रही है, जिससे परिवहन और खपत बिना किसी डर के जारी है।
सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग के भी आरोप
वन परिक्षेत्र अधिकारी ईश्वरी खुटे पर यह भी आरोप है कि वे हर शनिवार सरकारी वाहन का उपयोग निजी कार्य के लिए करते हुए अपने निवास स्थान जाते हैं। इससे सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग की आशंका भी जताई जा रही है।
बड़े सवाल जो जवाब मांगते हैं
आखिर “मोनू महराज” कौन है, जिसका नाम सुनते ही कार्रवाई रुक जाती है?
वन विभाग लकड़ी जब्त करने से क्यों बच रहा है?
क्या विभाग के भीतर से ही तस्करी को संरक्षण मिल रहा है?
क्या यह पूरा मामला उच्च स्तर तक जुड़ा हुआ है?
जंगल खतरे में, सिस्टम खामोश
लगातार हो रही अवैध कटाई से वन क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंच रहा है, लेकिन जिम्मेदार विभाग की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो जंगलों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि इन गंभीर आरोपों पर वन विभाग क्या रुख अपनाता है—जांच या फिर खामोशी?



