युद्ध विनाश का परिचायक, निर्माण के रथों को चाहिए शांतिपथ

वर्तमान समय में मानव समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती शांति की स्थापना है। इतिहास साक्षी है कि युद्ध का अंतिम परिणाम केवल और केवल विनाश होता है। यह न सिर्फ विकास की गति को रोकता है, बल्कि मानव जाति के अस्तित्व तक को खतरे में डाल देता है। स्पष्ट है कि मानव कल्याण केवल शांति में ही संभव है। निर्माण के रथ को गति देने के लिए शांतिपथ आवश्यक है, जबकि युद्ध उस मार्ग को अवरुद्ध करता है।
यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि कठोर यथार्थ है। भारत के प्रख्यात कवि गोपालदास ‘नीरज’ ने अपनी प्रसिद्ध पंक्तियों में लिखा है—
“बढ़ चुका बहुत अब आगे रथ निर्माणों का,
बमों के दलबल से अवरुद्ध नहीं होगा।”
मानव सभ्यता आज विकास के जिस उच्च सोपान पर खड़ी है, वहाँ युद्ध का विचार न केवल असभ्य, बल्कि बर्बर मानसिकता का प्रतीक है। प्रगति के मार्ग पर अग्रसर दुनिया को युद्ध की विभीषिका में झोंकने की सनक अमानवीय और आत्मघाती है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य चिंताजनक है। एक ओर रूस-यूक्रेन युद्ध वर्षों से जारी है, तो दूसरी ओर पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है। यदि इन संघर्षों को समय रहते नहीं रोका गया, तो इनके महायुद्ध का रूप लेने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। हर गुजरते दिन के साथ युद्ध का दायरा बढ़ रहा है और अधिक देश इसकी चपेट में आते जा रहे हैं।
जब विश्व की महाशक्तियाँ ही युद्धोन्मुखी नीति अपनाने लगें और शांति-प्रिय देश मौन धारण कर लें, तब महायुद्ध का खतरा और गहरा हो जाता है। महायुद्ध का अर्थ है—महाविनाश। आधुनिक घातक हथियारों के प्रयोग से संपूर्ण मानव सभ्यता संकट में पड़ सकती है।
महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का कथन आज भी प्रासंगिक है—
“मुझे नहीं पता तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, लेकिन चौथा विश्व युद्ध लाठी और पत्थरों से लड़ा जाएगा।”
यह कथन दूसरे विश्व युद्ध की भयावहता को देखकर ही जन्मा था। 1939 से 1945 तक चले इस युद्ध में लगभग 8 करोड़ लोग मारे गए। यूरोप और जापान के शहर खंडहर में बदल गए। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम हमलों ने मानवता को झकझोर दिया, जहाँ लाखों निर्दोष लोग पल भर में काल के गाल में समा गए।
इतिहास की यह त्रासदी आज भी चेतावनी देती है कि युद्ध कभी समाधान नहीं हो सकता। इसके बावजूद विश्व बार-बार उसी दिशा में बढ़ता दिख रहा है।
अब प्रश्न उठता है—दुनिया को महायुद्ध की ओर कौन धकेल रहा है? और इस संकट की घड़ी में शांति की पहल कौन करेगा?
वास्तविकता यह है कि अधिकांश युद्ध महाशक्तियों के अहंकार और संसाधनों पर नियंत्रण की लालसा से उत्पन्न होते हैं। सत्ता का यह अहंकार मानवता पर भारी पड़ता है। निर्णय कुछ लोगों द्वारा लिए जाते हैं, लेकिन उसका दुष्परिणाम पूरी मानव जाति भुगतती है।
ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हाल के घटनाक्रमों में संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा युद्ध विराम की अपील इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है, किंतु केवल अपील पर्याप्त नहीं—ठोस और प्रभावी प्रयास आवश्यक हैं।
इस परिप्रेक्ष्य में आम जनता की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। इतिहास बताता है कि अधिकांश युद्ध शासकों के निर्णय का परिणाम होते हैं, न कि जनता की इच्छा का। आज का शिक्षित और जागरूक समाज युद्ध का समर्थक नहीं है, लेकिन उसकी चुप्पी को अक्सर सहमति मान लिया जाता है। इसलिए आवश्यक है कि जनता शांति के पक्ष में मुखर हो।
भारत इस वैश्विक संकट में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत की सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपरा सदैव विश्व शांति की पक्षधर रही है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे आदर्श पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देते हैं।
आज जब दुनिया संघर्षों से जूझ रही है, भारत के पास अवसर है कि वह निष्पक्ष और निर्भीक होकर शांति की वकालत करे। किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय भारत को मध्यस्थता और संवाद का मार्ग अपनाना चाहिए।
जो राष्ट्र इस संकट की घड़ी में शांति स्थापना में सार्थक भूमिका निभाएगा, वही वैश्विक नेतृत्व का दावेदार बनेगा। भारत अपनी नीतियों, मूल्यों और विचारधारा के माध्यम से विश्व को एक नई दिशा दे सकता है।
अंततः यही कहा जा सकता है कि युद्ध मानवता का शत्रु है और शांति उसका एकमात्र समाधान। यदि हमें विकास, समृद्धि और मानव अस्तित्व को सुरक्षित रखना है, तो युद्ध नहीं—शांति का मार्ग अपनाना होगा।
नरेंद्र तिवारी
स्वतंत्र लेखक
शंकर गली, मोतीबाग, सेंधवा (जिला बड़वानी, म.प्र.)
मो. 8770469542




