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सफेदपोशों की सियासत में नदियों का चीरहरण!केवई नदी की कराह मशीनों की गड़गड़ाहट में दब गई

एम. सी. बी. (छत्तीसगढ़ उजाला)
एमसीबी जिले में बहने वाली केवई नदी इन दिनों सुर्खियों में है। कभी जीवनदायिनी मानी जाने वाली यह नदी अब अवैध रेत खनन के आरोपों से जूझ रही है। सुनहरी रेत, जो विकास कार्यों की बुनियाद मानी जाती है, अब कथित तौर पर राजनीतिक संरक्षण में चल रहे खनन खेल की पहचान बनती जा रही है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि दिन में सन्नाटा और रात के अंधेरे में मशीनों की आवाज़—यह सिलसिला लंबे समय से जारी है। सवाल सिर्फ खनन माफियाओं का नहीं, बल्कि उन सफेदपोश चेहरों का भी है जो मंच से पर्यावरण संरक्षण की बात करते हैं, लेकिन ज़मीन पर हो रही रेत की लूट पर चुप्पी साध लेते हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मामला किसी एक दल तक सीमित नहीं है। कांग्रेस हो या भाजपा—दोनों दलों के कुछ प्रभावशाली लोगों पर संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं। हालांकि किसी भी पक्ष ने इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
इधर, खनिज विभाग की निष्क्रियता पर सवाल उठ रहे हैं। वन विभाग की चुप्पी और पुलिस की संदिग्ध गश्त को लेकर भी जनमानस में असंतोष है। यदि खनन पूरी तरह नियमों के तहत हो रहा है, तो फिर रात के समय भारी मशीनों की आवाज़ क्यों सुनाई देती है? नदी का सीना छलनी हो रहा है, पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है और शासन को मिलने वाला राजस्व भी प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित रेत खनन से नदी की धारा बदल सकती है, भू-जल स्तर गिर सकता है और आसपास के गांवों पर दीर्घकालिक दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं।
अब जनता पूछ रही है—
यह सिर्फ रेत का कारोबार है या लोकतंत्र के मूल्यों का भी अपहरण?
जब तक जिम्मेदार विभाग पारदर्शी कार्रवाई नहीं करते और वास्तविक स्थिति सार्वजनिक नहीं होती, तब तक केवई नदी की कराह यूं ही मशीनों की गड़गड़ाहट में दबती रहेगी।

प्रशांत गौतम

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