शिक्षा विभाग बना उगाही का अड्डा: 1282 दिन का मेडिकल अवकाश, 218 करोड़ के हिसाब का खेल: बीईओ की संदिग्ध भूमिका और मेडिकल छुट्टी की आड़ में महालूट की बड़ी साज़िश!

कवर्धा(छत्तीसगढ़ उजाला)-कबीरधाम जिले के शिक्षा विभाग में 218 करोड़ रुपये के हिसाब–किताब में गड़बड़ी के बीच अब ‘मेडिकल अवकाश घोटाले’ ने मामले को और गंभीर बना दिया है। दो बाबुओं के निलंबन के बाद विभाग अपनी पीठ थपथपा रहा है, लेकिन तत्कालीन बीईओ पर कार्रवाई न होने से सवाल और तेज हो गए हैं। मामला सत्तापक्ष के विधायक द्वारा विधानसभा में उठाए जाने की तैयारी के साथ अब राजनीतिक रंग भी लेता दिख रहा है।
1282 दिन का मेडिकल अवकाश, पूरा वेतन जारी
आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार, सहायक शिक्षक श्रीमती शकुंतला चौधरी को अलग-अलग अवधियों में कुल 1282 दिन का मेडिकल अवकाश स्वीकृत किया गया—
13/02/2019 से 16/06/2021 – 855 दिन
21/02/2022 से 10/04/2022 – 49 दिन
08/11/2022 से 29/01/2023 – 83 दिन
04/09/2023 से 25/06/2024 – 295 दिन
चौंकाने वाली बात यह है कि इतने लंबे अवकाश के बावजूद उन्हें नियमित रूप से पूरा वेतन भुगतान होता रहा। अवकाश सेवा पुस्तिका में दर्ज भी नहीं किया गया। नियमों के अनुसार, एक कर्मचारी को प्रतिवर्ष 20 दिन का मेडिकल अवकाश मिलता है, जो जमा होकर भी सीमित अवधि तक ही उपयोग में लाया जा सकता है। ऐसे में 1282 दिन का अवकाश स्वीकृत होना गंभीर अनियमितता की ओर इशारा करता है।
अन्य शिक्षकों के मामलों में भी गड़बड़ी
जांच में अन्य नाम भी सामने आए—
लखीराम बरिहा (सहायक शिक्षक) – 11/09/2018 से 31/10/2024 के बीच 11 किस्तों में 265 दिन का मेडिकल अवकाश, जबकि खाते में पर्याप्त अवकाश नहीं।
प्यारे सिंह राजपूत (प्रधानपाठक) – 3 बार में 130 दिन का अवकाश, सेवा पुस्तिका में प्रविष्टि नहीं।
कुम्भकरण कौशिक (प्रधानपाठक) – 218 दिन लगातार सहित कुल 238 दिन का अवकाश, लेकिन सर्विस बुक में उल्लेख नहीं।
संगीता (सहायक शिक्षक) – 132 दिन का अवकाश, खाते से घटाया नहीं गया।
ऑडिट टीम की टिप्पणी ने बढ़ाए सवाल
जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा गठित ऑडिट टीम को वर्तमान विकासखंड शिक्षा अधिकारी ने 25/11/2025 के पत्र में लिखा कि कर्मचारियों द्वारा लिए गए अवकाश को अवकाश लेखा में नहीं घटाया गया और न ही स्वीकृति आदेश जारी हुआ, फिर भी अवकाश अवधि का वेतन भुगतान कर दिया गया।
यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही या संभावित मिलीभगत हुई है।
बीईओ की भूमिका संदिग्ध
मामले में तत्कालीन बीईओ एम. एल. पटैला और संजय जासवाल की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, आर्थिक लाभ लेकर मामले को दबाने की कोशिश की गई। हालांकि, संजय जासवाल ने स्वयं को निर्दोष बताते हुए फंसाए जाने की बात कही है।
यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि सुनियोजित भ्रष्टाचार का मामला बन सकता है।
जिला ट्रेजरी अधिकारी के अनुसार:
प्रत्येक शासकीय कर्मचारी को प्रतिवर्ष 20 दिन मेडिकल अवकाश की पात्रता होती है।
अवकाश खाते में जितना बैलेंस होगा, उतना ही स्वीकृत किया जा सकता है।
अधिक होने पर “नो वर्क, नो पे” लागू होता है।
बिना स्वीकृति वेतन भुगतान गंभीर अनियमितता है।
218 करोड़ प्रकरण से जुड़ता तार?
218 करोड़ रुपये के हिसाब–किताब गायब होने के मामले में पहले ही दो बाबू निलंबित हो चुके हैं। अब मेडिकल अवकाश और वेतन भुगतान में सामने आई अनियमितताएं संकेत देती हैं कि विभागीय वित्तीय प्रबंधन में व्यापक स्तर पर गड़बड़ियां हो सकती हैं।
सवाल यह भी उठ रहा है कि जब बाबुओं के निलंबन से गड़बड़ी की पुष्टि होती है, तो बीईओ पर कार्रवाई क्यों नहीं?
आगे और खुलासे संभव
सूत्रों के अनुसार, आगामी दिनों में,अनुकंपा नियुक्ति में कथित गड़बड़ी,निजी स्कूल को फर्जी मान्यता,मेडिकल बिलों के गायब होने,जांच रिपोर्ट में विसंगतियों जैसे मामलों का भी खुलासा हो सकता है।
डीईओ का बयान
जिला शिक्षा अधिकारी एफ.आर. वर्मा ने मामले को गंभीर बताते हुए जांच कराए जाने और उच्च अधिकारियों को कार्रवाई हेतु पत्र भेजने की पुष्टि की है।
बड़ा सवाल
1282 दिन का मेडिकल अवकाश, लाखों का वेतन भुगतान, सेवा पुस्तिका में प्रविष्टि नहीं, और बिना स्वीकृति आदेश के भुगतान—
क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर किसी बड़े लेन-देन का हिस्सा?
अब सबकी निगाहें निष्पक्ष जांच और संभावित विधानसभा चर्चा पर टिकी हैं।



