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‘बेटी दे दो, वरना SC/ST एक्ट में फँसा दूँगा’: बस्ती में 6 साल की कथित छेड़खानी, भाई पर जानलेवा हमला और क्रॉस FIR से गरमाया मामला


बस्ती (उत्तर प्रदेश)। बस्ती जिले के मुंडेरवा थाना क्षेत्र से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने कानून के दुरुपयोग, कथित छेड़खानी और हिंसक झड़प—तीनों को एक साथ खड़ा कर दिया है। एक परिवार का आरोप है कि उनकी बेटी को पिछले छह वर्षों से एक युवक परेशान कर रहा था। विरोध करने पर परिवार को कथित तौर पर SC/ST एक्ट में फँसाने की धमकी दी गई। 18 फरवरी को विवाद ने हिंसक रूप ले लिया और छात्रा के भाई पर जानलेवा हमला हुआ। अगले ही दिन दूसरे पक्ष ने भी जातिसूचक गाली और मारपीट का आरोप लगाते हुए क्रॉस FIR दर्ज करा दी।
पहली FIR: छेड़खानी, धमकी और हमला
पीड़िता के पिता की शिकायत के अनुसार, उनकी बेटी महर्षि वशिष्ठ मेडिकल कॉलेज, बस्ती में पैरामेडिकल कोर्स की छात्रा है। आरोप है कि परसा बोधी निवासी मंगेश (पुत्र ओमप्रकाश) छह साल से फोन और रास्ते में रोककर प्रताड़ित करता रहा। समझाने पर उसने अपनी जाति का हवाला देते हुए SC/ST एक्ट में फँसाने की धमकी दी—ऐसा परिवार का दावा है।
परिवार का कहना है कि 18 फरवरी की शाम करीब 5 बजे, जब छात्रा का भाई चौराहे की ओर जा रहा था, तब आरोपित 20–25 लोगों के साथ पहुँचा और लाठी-डंडों व धारदार हथियारों से हमला किया। युवक के सिर में गंभीर चोट आई और वह लहूलुहान हालत में घर पहुँचा। उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया।
दूसरी FIR: जातिसूचक गाली और मारपीट का आरोप
19 फरवरी को दूसरे पक्ष—लव कुमार (पुत्र राम नरेश)—की ओर से भी शिकायत दर्ज कराई गई। इसमें अनिल दूबे के बेटों पर गाली-गलौज, जातिसूचक शब्दों के प्रयोग और मारपीट का आरोप लगाया गया है। यानी अब मामला क्रॉस केस में बदल चुका है, जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं।
तनावपूर्ण माहौल, निष्पक्ष जाँच की माँग
मुंडेरवा इलाके में घटना के बाद तनाव की स्थिति बताई जा रही है। छात्रा के परिवार का कहना है कि वे छह साल से कथित ब्लैकमेलिंग और डर के साये में जी रहे थे और अब उन्हें निष्पक्ष जाँच चाहिए। वहीं दूसरे पक्ष का दावा है कि उनके साथ जातिसूचक अपमान और मारपीट हुई है।
पुलिस के सामने अब दोहरी चुनौती है—
क्या छह साल की कथित प्रताड़ना और धमकियों के आरोपों के सबूत मिलते हैं?
18 फरवरी की हिंसा में वास्तविक हमलावर कौन थे?
क्या किसी कानून का दुरुपयोग हुआ, या सच में जातिसूचक अपराध घटित हुआ?
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह के मामलों में अक्सर समझौते का दबाव और कानून के नाम पर भय का वातावरण बनता है। ऐसे में निष्पक्ष, साक्ष्य-आधारित जाँच ही सच सामने ला सकती है।

यह मामला सिर्फ दो परिवारों का विवाद नहीं, बल्कि कानून के सही उपयोग बनाम दुरुपयोग के आरोपों की परीक्षा भी है। अब निगाहें बस्ती पुलिस की जाँच पर टिकी हैं—ताकि पीड़ित को न्याय और दोषी को दंड मिल सके, चाहे वह किसी भी पक्ष से

प्रशांत गौतम

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