*शासकीय राशन के नाम पर लुटे जा रहे गरीब, 35 किलो में 34 चावल और 1 किलो में 6 सौ ग्राम शक्कर, समूह कलेक्टर का बता रहा धौंस* *प्रशासन मौन, संचालक बता रहा प्रशासन को खरीदने की बात*
छत्तीसगढ़ उजाला

कोरबा/पाली (छत्तीसगढ़ उजाला)। कलेक्टर साहब आप भले ही जिले की गद्दी में बैठकर अधीनस्थ अधिकारियों को आदेश पारित करते होंगे, लेकिन जरा आपको मालूम है क्या की आपके नाक नीचे पाली नगर पंचायत सोसायटी संचालक अपनी ऊंची पहुँच का धौंस बताते हुए प्रति 35 किलो चावल में 34 किलो तो एक किलो शक्कर में 6 या 7 सौ ग्राम हितग्राहियों को वितरण कर रहा है। बीते कांग्रेस शासनकाल में भी ऐसा नही हुआ जो अब भाजपा शासन में मनमानी हो रहा है, हितग्राहियों की कोई सुनता नही और शासन प्रशासन गूंगा, बहरा बना बैठा है, नतीजतन सोसायटियों में मनमानी चल रही है और दंम्भ भरा जा रहा कि मेरा कौन क्या बिगाड़ लेगा…! यह हालात न सिर्फ सरकार की छवि किरकिरी कर रही बल्कि प्रशासन पर सवाल भी उठा रही है। पाली नगर में सोसायटी के संचालनकर्ता जननी स्व. सहायता समूह एवं शाकम्भरी स्व. सहायता समूह की जिम्मेदारी तो वैसे महिलाओं को है लेकिन कार्यभार पुरुष पति प्रधान सम्हाल रहे है और यही कारण है कि सोसायटी के जिम्मेदारी के दौरान 35 की जगह 34 चावल तो 1 किलो की जगह महज 6- 7 सौ ग्राम शक्कर हितग्राहियों को दिया जा रहा है। यदि कोई हितग्राही विरोध करे तो उसका राशनकार्ड कटवा देने की धमकी दी जा रही है।
सोसायटी के चावल सोसायटी में ही खरीद करते कालाबाजारी
पाली नगर के राशन दुकानों का संचालन करने वाले समूह की महिलाओं के चतुर पति इतने माहिर है कि मनमाने राशन वितरण को अंजाम दे रहे है। आपको बता दें कि अधिकतर उपभोक्ता सोसायटी राशन का उपयोग नही करते और दुकानों में बदलकर दूसरे चांवल लेते है, तो यह प्रक्रिया पाली के सरकारी दुकान में भी अपनाई जा रही है और 20 से 25 रुपए की दर से सोसायटी में ही हितग्राहियों के राशन खरीदने की व्यवस्था बना रखी गई है, जो कालाबाजारी के भेंट चढ़ रही है। पाली नगर राशनकार्ड उपभोक्ताओं की संख्या हजार में होगी, यदि एक उपभोक्ता के राशन में आधा किलो डांडी मारी जाए तो तकरीबन 500 किलो चावल का गबन प्रतिमाह उजागर होता है। यदि नगर के सोसायटियों का औचक निरीक्षण किया जाए तो भंडारण से आधी की राशन का मामला उजागर होगा। मुख्यालय में एसडीएम सहित सभी जिम्मेदार अधिकारी की पदस्थापना है लेकिन वे केवल औपचारिकता निभाते हुए अपना काम कर रहे है, उपभोक्ता डर से कुछ बोल नही रही और सोसायटी संचालक मनमानी पर उतारू है, जनप्रतिनिधियों के जुबां पर भी ताला लगा है, ऐसे में कौन मसीहा है जो गरीब के चावल में डाले जा रहे डांके पर विराम लगा सके?



