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फौव्हारा चौक का चार मंजिला भवन: दस्तावेज़ पूरे, नपाई रिपोर्ट स्पष्ट… फिर कार्रवाई क्यों शून्य?

बैकुंठपुर-(छत्तीसगढ़ उजाला)
कोरिया जिला मुख्यालय के सबसे संवेदनशील और व्यस्त इलाके फौव्हारा चौक पर खसरा नंबर 155/2 में निर्मित चार मंजिला भवन आज पूरे जिले में प्रशासनिक रहस्य बन चुका है। सवाल यह नहीं कि अवैध निर्माण हुआ या नहीं—सवाल यह है कि सब कुछ साबित होने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार उक्त भूखंड पर लगभग 3500 वर्गफुट क्षेत्र में निर्माण किया गया है, जबकि स्वीकृति केवल 1546 वर्गफुट की थी। यानी नियमों को खुलेआम ताक पर रखकर दोगुने से अधिक क्षेत्र में निर्माण, और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि नजूल अधिकारी एवं कलेक्टर कोरिया के आदेश पर दो बार नपाई कराई जा चुकी है। नपाई प्रतिवेदन में अतिरिक्त और अवैध निर्माण स्पष्ट रूप से दर्ज है। इसके बावजूद न तो निर्माण हटाया गया, न सीलिंग हुई और न ही कोई दंडात्मक कार्रवाई—यह अपने आप में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
सुरक्षा और महिला गरिमा पर भी खतरा, फिर भी खामोशी
इस भवन के ठीक समीप जिला जेल स्थित है। स्थानीय नागरिकों के अनुसार जेल परिसर पर दो बार हमले जैसी घटनाएं हो चुकी हैं। इसके अलावा चार मंजिला भवन की ऊंचाई के कारण जेल में निरुद्ध महिलाओं की निजता के उल्लंघन का गंभीर मामला भी सामने आया है।
इस संबंध में जेल विभाग, नजूल विभाग सहित अन्य विभागों द्वारा लिखित प्रतिवेदन प्रशासन को सौंपे जा चुके हैं, फिर भी फाइलें आगे नहीं बढ़ीं।
कांग्रेस से भाजपा तक—दबाव की कहानी वही
चर्चा है कि कांग्रेस शासनकाल में जहां कांग्रेस नेताओं और मंत्रियों के दबाव में मामला ठंडे बस्ते में डाला गया, वहीं अब भाजपा शासनकाल में भी भाजपा के जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियों के दबाव की बातें सामने आ रही हैं। नतीजा—मामला वर्षों से फाइलों में दबा पड़ा है और अवैध भवन जस का तस खड़ा है।
कमजोर पर सख्ती, प्रभावशाली पर नरमी?
विडंबना यह है कि जिले में एक साधारण कर्मचारी या आम नागरिक की शिकायत पर प्रशासन तत्काल कार्रवाई करता है, लेकिन जहां नपाई रिपोर्ट, विभागीय प्रतिवेदन और स्पष्ट नियम उल्लंघन मौजूद हैं, वहां कार्रवाई शून्य है। इससे यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या नियम सिर्फ कमजोरों के लिए हैं?
आज फौव्हारा चौक का यह चार मंजिला भवन सिर्फ एक अवैध निर्माण नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता, राजनीतिक दबाव और दोहरे मापदंडों का प्रतीक बन चुका है।
जब सबूत पूरे हैं, तो कार्रवाई में बाधा कौन है?

प्रशांत गौतम

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