मंच से अपमान, सड़क पर साहित्यकार: गुरु घासीदास विश्वविद्यालय विवाद राष्ट्रपति तक

छत्तीसगढ़ उजाला-बिलासपुर स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय गुरु घासीदास में आयोजित राष्ट्रीय साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान एक वरिष्ठ साहित्यकार के कथित अपमान का मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। घटना के विरोध में पहले कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव द्वारा राष्ट्रपति को पत्र लिखे जाने के बाद अब शहर के साहित्यकार भी खुलकर सामने आ गए हैं।
शुक्रवार को कथाकार रामकुमार तिवारी और प्रख्यात उपन्यासकार द्वारिका प्रसाद अग्रवाल के नेतृत्व में बिलासपुर के साहित्यकारों का एक प्रतिनिधिमंडल कलेक्टर कार्यालय पहुँचा और जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर अपनी गहरी नाराजगी और पीड़ा दर्ज कराई।
“यह केवल एक लेखक का नहीं, पूरे साहित्यिक समाज का अपमान है”
ज्ञापन में कहा गया है कि बिलासपुर के लेखक, विचारक और रचनाकार सदैव समाज, संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों के सजग प्रहरी रहे हैं। लेकिन 7 जनवरी 2024 को गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में जो हुआ, उसने न केवल विश्वविद्यालय की गरिमा को ठेस पहुँचाई, बल्कि पूरे साहित्यिक समाज को आहत किया है।
साहित्यकारों के अनुसार, “समकालीन हिन्दी कहानी” विषय पर आयोजित संवाद कार्यक्रम में आमंत्रित अतिथि कथाकार मनोज रूपाणी के साथ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आलोक कुमार चक्रवाल ने सार्वजनिक रूप से अमर्यादित व्यवहार किया। आरोप है कि कुलपति ने भरे मंच से अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते हुए यह कहते हुए लेखक को कार्यक्रम छोड़ने का निर्देश दिया—“इन्हें बुलाया किसने है?”
और उन्हें सभा से बाहर जाने को कहा गया।
कुलपति का व्यवहार पद की गरिमा के विपरीत : साहित्यकार
साहित्यकारों ने कहा कि किसी आमंत्रित अतिथि के साथ इस प्रकार का व्यवहार न तो भारतीय संस्कृति के अनुरूप है और न ही केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति जैसे संवैधानिक पद की गरिमा के अनुकूल। यह घटना केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि साहित्य, संवाद और अकादमिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।
कथाकार रामकुमार तिवारी ने कहा,
“भरे मंच पर किसी साहित्यकार का अपमान पूरे रचनात्मक समाज का अपमान है। यह पीड़ा असहनीय है।”
वहीं उपन्यासकार द्वारिका प्रसाद अग्रवाल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा,
“यह सोचकर शर्म आती है कि बिलासपुर का नाम देशभर में इस तरह लिया जा रहा है। हमारी पहचान साहित्य और संस्कृति से रही है, लेकिन कुलपति के व्यवहार ने पूरे शहर को शर्मिंदगी में डाल दिया है।”
राष्ट्रपति तक बात पहुँचाने की मांग
साहित्यकारों ने जिला प्रशासन से आग्रह किया कि इस गंभीर घटनाक्रम को औपचारिकता तक सीमित न रखा जाए और राष्ट्रपति तक उनकी बात पहुँचाई जाए। ज्ञापन में मांग की गई है कि कुलपति के आचरण को देखते हुए उनके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए और उन्हें पद से हटाया जाए, ताकि केंद्रीय विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गरिमा और विश्वास बहाल हो सके।
बड़ा सवाल
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या केंद्रीय विश्वविद्यालयों में संवाद, सम्मान और अकादमिक स्वतंत्रता की परंपरा को बचाने के लिए शीर्ष स्तर पर ठोस कदम उठाए जाएंगे, या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह औपचारिकताओं में उलझकर रह जाएगा।




