बिलासपुर

तुम तो ठहरे परदेशी साथ क्या निभाओगे?, कांग्रेस द्वारा देवेन्द्र यादव को लोकसभा बिलासपुर से टिकट देने पर आपा शियासी भूचाल

छत्तीसगढ उजाला

 

बिलासपुर (छत्तीसगढ उजाला)। बीते 1982 के दौर में एक हिंदी फिल्म आई थी। नाम था निकाह। गायिका थी सलमा आगा। गाने के बोल थे, दिल के अरमां आंसुओं में बह गए…। तब इस गाने ने धूम मचाई थी। लोगों की जुबान पर चढ़ गया था। बताते हैं-बताते हैं। वाक्या ही कुछ ऐसा है कि कुछ जमकर भूमिका बांधनी पड़ रही है। होली के दूसरे दिन कांग्रेस ने बिलासपुर समेत तीन लोकसभा सीटों के लिए उम्मीदवार के नाम एलान किया। यह क्या? नाम सामने आते ही विरोध की राजनीति शुरू हो गई। कइयों के दिल टूट गए। निकाह के अंदाज में। दिल टूटने वाले विरोध की हिम्मत नहीं जुटा पाए। जिसने जुटाई वह छा गए। कांग्रेस भवन में गांधीगीरी शुरू हो गई है। आजतक जो नहीं हुआ वह हो रहा है। ये दिन भी नामचीनों को देखनी थी। जमीन पर बैठे गांधीगीरी करने वाले कांग्रेसी नेता को मनाने में जिम्मेदारों का पसीना छूट रहा है।
शहर की राजनीति के क्या कहने। पल में सोना और पल में मासा वाली कहावत की तरह कभी कहीं आबाद तो कभी कहीं वीरानी। पांच साल पहले देखें तो शहर की राजनीति की तासीर कुछ अलग थी। तासीर भी ऐसी कि लोग गुब्बारा के बजाय जमीन उड़ाने लगे थे। तभी तो भैया को कहना पड़ा था कि बिलासपुर में तो माफिया जमीन उड़ा रहे हैं। पांच साल जमकर उड़ाई और इसी अंदाज में जेब भरने का काम भी किया। भैया के फार्म में आते ही जमीन उड़ाने वाले माफिया के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी हैं। यहां तक सब ठीक है। भैया के दरबार में ऐसे लोगों की एंट्री हो गई है जो फोटो खिंचाकर अपना काम जमकर करने लगे थे। भला हो शुभचिंतकों का जिसने समय रहते भैया तक बात पहुंचा दी। बात पहुंची और एंट्री बंद। इस मामले में भैया का जवाब नहीं। तभी तो दरबार में सब-कुछ ठीक रहता है।
विधानसभा चुनाव को हुए तीन महीने से ज्यादा हो गए हैं। सरकार अब दौड़ने लगी है। पड़ोसी विधानसभा के भाजपाई अब भी नेताजी को स्वीकार नहीं कर पाए हैं। या यूं कहें कि इनकी स्वीकार्यता अब भी क्षेत्र में नहीं बन पाई है। तभी तो भाजपाई अब कहने लगे हैं कि थोड़े दिन की बात है, सत्ता का विकेंद्रीकरण होकर रहेगा। सभा समारोह में बड़े मंच पर अब एक नहीं दो बड़ी कुर्सी लगेगी। तब हमारा नेता पावर के साथ मंच शेयर करते नजर आएंगे। हमारा नेता का आशय तो आप समझ ही रहे होंगे। स्थानीय और बाहरी का भाव अब भी पड़ोसी विधानसभा के भाजपाइयों के मन से निकल नहीं पाया है। विधानसभा चुनाव के दौर से लेकर अब तक जो कसक इनके मन में है जल्द ही दूर होने वाली है। इतना इशारा आपके लिए काफी होगा। अपने और पराए के बीच फर्क रहना स्वाभाविक बात है।
होलियाना माहौल के बीच कांग्रेस ने लोकसभा की बाकी बची सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। बस फिर क्या था। दौड़ में शामिल नेताओं का मूड ही खराब हो गया। एक साथ दो सीन नजर आया। कांग्रेसी दावेदारों का मूड बिगड़ा तो भाजपाइयों की होली और भी रंगीन हो गई। होली के दौर में राजनीतिक हुड़दंग ने और भी रंग भर दिया। रंग भरे मौसम में अब फिल्मी गानों की बहार आ गई है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर भाजपाई जमकर एक ही गाने को बजा रहे हैं। तुम तो ठहरे परदेशी साथ क्या निभाओगे… आगे का पैरोडी और भी लाजवाब है। सुबह वाली गाड़ी से कोयले का कमीशन जो ले जाओगे। कोल स्कैम का दाग छूटे नहीं छूट रहा है। राजनीति का रंग देखिए जनाब। भाजपाई तो भाजपाई टिकट की दौड़ में रेस में पिछड़े और धड़ाम से गिरने वाले कांग्रेसी दावेदार भी इसे लाइक पर लाइक कर रहे हैं।

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