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दूसरी बार भी अमान्य हुआ महिला एवं बाल विकास विभाग की संयुक्त संचालक क्रिस्टीना एस. लाल का ST प्रमाण-पत्र, अब कार्रवाई में देरी पर उठे सवाल

रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-महिला एवं बाल विकास विभाग की संयुक्त संचालक क्रिस्टीना एस. लाल के अनुसूचित जनजाति (गोंड) जाति प्रमाण-पत्र को उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति द्वारा दूसरी बार भी अमान्य घोषित किए जाने के बाद अब प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। समिति ने 21 जुलाई 2026 को विस्तृत आदेश जारी करते हुए वर्ष 2015 में दिए गए अपने पूर्व निर्णय को पुनः वैध ठहराया है। इसके बावजूद आदेश जारी होने के कई दिन बाद भी संबंधित विभागों की ओर से किसी प्रकार की विभागीय कार्रवाई सामने नहीं आने से प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।

2015 में भी समिति ने किया था प्रमाण-पत्र निरस्त

यह मामला वर्षों पुराना है। वर्ष 2015 में उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति ने जांच के बाद क्रिस्टीना एस. लाल का अनुसूचित जनजाति (गोंड) जाति प्रमाण-पत्र अमान्य घोषित कर दिया था। इसके बाद उन्होंने इस निर्णय को उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जहां से उन्हें अंतरिम राहत मिली और वे शासकीय सेवा में बनी रहीं।

बाद में न्यायालय के निर्देश पर मामले की दोबारा सुनवाई की गई। पुनर्गठित छानबीन समिति ने सभी पक्षों को सुनने, दस्तावेजों और जांच रिपोर्टों का परीक्षण करने के बाद फिर से वही निष्कर्ष निकाला कि प्रस्तुत जाति प्रमाण-पत्र वैध नहीं है।

समिति के आदेश में क्या कहा गया?

21 जुलाई 2026 को जारी आदेश में समिति ने स्पष्ट उल्लेख किया है कि उपलब्ध दस्तावेजों, विजिलेंस जांच, राजस्व अभिलेखों, ग्राम स्तर की जांच तथा सभी पक्षों की सुनवाई के आधार पर यह पाया गया कि क्रिस्टीना एस. लाल का अनुसूचित जनजाति (गोंड) जाति प्रमाण-पत्र विधिसम्मत नहीं है।

समिति ने अपने 17 जून 2015 के पूर्व आदेश को पुनः मान्य करते हुए संबंधित अधिनियम के प्रावधानों के तहत आगे की आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) को अधिकृत किया है।

अब सबसे बड़ा सवाल – कार्रवाई कब होगी?

समिति के अंतिम निष्कर्ष के बाद अब सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि 21 जुलाई 2026 को आदेश जारी होने के बावजूद अब तक महिला एवं बाल विकास विभाग अथवा सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से सेवा संबंधी या अन्य विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

जानकारी के अनुसार आदेश की प्रतिलिपि सामान्य प्रशासन विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग तथा अन्य संबंधित अधिकारियों को भेजी जा चुकी है। ऐसे में कार्रवाई में हो रही देरी को लेकर प्रशासनिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख

जाति प्रमाण-पत्र विवादों से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय विभिन्न निर्णयों में यह सिद्धांत स्थापित कर चुका है कि यदि सक्षम छानबीन समिति किसी कर्मचारी का जाति प्रमाण-पत्र अमान्य घोषित करती है, तो आगे की कार्रवाई संबंधित कानून, नियमों और न्यायालय के लागू निर्देशों के अनुसार की जानी चाहिए। हालांकि प्रत्येक मामले में अंतिम कार्रवाई उस प्रकरण की कानूनी स्थिति और न्यायालय के प्रभावी आदेशों पर निर्भर करती है।

क्या फिर अदालत का रुख करेंगी क्रिस्टीना एस. लाल?

अब सभी की निगाह इस बात पर टिकी है कि क्या क्रिस्टीना एस. लाल इस नए आदेश को भी उच्च न्यायालय में चुनौती देंगी या फिर यदि किसी न्यायालय से नई अंतरिम राहत नहीं मिलती है, तो महिला एवं बाल विकास विभाग तथा सामान्य प्रशासन विभाग नियमानुसार आगे की कार्रवाई करेंगे।

फिलहाल 21 जुलाई 2026 को जारी समिति के आदेश ने एक बड़ा प्रशासनिक और कानूनी प्रश्न खड़ा कर दिया है—जब उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति दूसरी बार भी जाति प्रमाण-पत्र को अमान्य घोषित कर चुकी है, तो संबंधित विभागों द्वारा आगे की कार्रवाई में देरी आखिर किस कारण हो रही है।

प्रशांत गौतम

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