सशक्त हस्ताक्षर की स्वर्णिम 50वीं काव्य गोष्ठी संपन्न, साहित्यकारों की रचनाओं से गुंजायमान हुआ सभागार

जबलपुर। साहित्यिक संस्था ‘सशक्त हस्ताक्षर’ की स्वर्णिम 50वीं काव्य गोष्ठी का आयोजन चंचलबाई महाविद्यालय में उत्साह और गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में शहर एवं विभिन्न क्षेत्रों से आए साहित्यकारों और कवियों ने अपनी उत्कृष्ट रचनाओं का पाठ कर साहित्य प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम के संस्थापक गणेश श्रीवास्तव ‘प्यासा’ ने सभी अतिथियों, साहित्य मनीषियों एवं उपस्थित रचनाकारों का स्वागत एवं अभिनंदन किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. अलकेश चतुर्वेदी रहे, जबकि अध्यक्षता महामहोपाध्याय आचार्य डॉ. हरिशंकर दुबे ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. सुरेन्द्रलाल साहू ‘निर्विकार’, डॉ. अरुणा पाण्डे एवं मंगल भाव कवि संगम त्रिपाठी की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम में अरुण शुक्ल, अमरनाथ सोनी, महेश स्थापक, दिवाकर शर्मा एवं प्रीति शुक्ला ने अतिथियों के स्वागत-अभिनंदन में सहभागिता निभाई। सरस्वती वंदना अनुराधा गर्ग ‘दीप्ति’ ने प्रस्तुत कर कार्यक्रम का शुभारंभ कराया।
काव्य गोष्ठी का शुभारंभ कालिदास ताम्रकार ‘काली’ के काव्य पाठ से हुआ। इसके बाद सुवीर श्रीवास्तव ‘वीर’, शिवानी भगत, प्रकाश सिंह ठाकुर (इन्द्राना), कुंजीलाल चक्रवर्ती ‘निर्झर’ (भेड़ाघाट), उर्मिला श्रीवास्तव, विवेक कुमार गुप्ता ‘सहर’, आशा मालवीय, अखिलेश खरे ‘अखिल’, प्रेम कुमार पालीवाल, दीनदयाल तिवारी ‘बेताल’, जयप्रकाश श्रीवास्तव, कौशिक सेन गुप्ता, प्रभा विश्वकर्मा ‘शील’, लखन रजक, विजय सिन्हा ‘कमर इलाहावादी’, सुशील श्रीवास्तव, मदन श्रीवास्तव, श्रीमती तरुणा श्रीवास्तव, प्रीति नामदेव ‘भूमिजा’, विजय विश्वकर्मा, पं. निरंजन द्विवेदी ‘वत्स’, डॉ. मुकुल तिवारी, अमर सिंह वर्मा, वंदना सोनी ‘विनम्र’, संध्या द्विवेदी, एम.एल. शर्मा ‘नयन’ एवं ज्योति मिश्रा सहित अनेक कवियों ने अपनी प्रभावशाली रचनाओं की प्रस्तुति देकर सभागार को तालियों से गुंजायमान कर दिया।
मंचासीन अतिथियों ने भी अपनी साहित्यिक प्रस्तुतियों से कार्यक्रम को नई ऊँचाइयों तक पहुंचाया। काव्य गोष्ठी का सफल संचालन गणेश श्रीवास्तव ‘प्यासा’ ने किया, जबकि तरुणा खरे ‘तनु’ ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।
यह स्वर्णिम 50वीं काव्य गोष्ठी साहित्य, संस्कृति और रचनात्मक अभिव्यक्ति का एक यादगार आयोजन साबित हुई, जिसमें कवियों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को देर तक बांधे रखा



