आदेशों की अनदेखी या अंदरखाने सेटिंग…? 100 सीटर छात्रावासों की अधीक्षिकाएं वर्षों से स्कूल से गायब, फिर भी जारी पूरा वेतन! “शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे बड़े सवाल”

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही(छत्तीसगढ़ उजाला)-जिले के शिक्षा विभाग में एक बार फिर गंभीर लापरवाही और विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। शासन और कलेक्टर के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जिले के विभिन्न 100 सीटर छात्रावासों में पदस्थ प्रभारी अधीक्षिकाएं कथित तौर पर वर्षों से अपने मूल विद्यालयों में अध्यापन कार्य नहीं कर रहीं, लेकिन नियमित रूप से पूरा वेतन प्राप्त कर रही हैं। मामला अब केवल लापरवाही तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि आदेशों की खुली अवहेलना और विभागीय मिलीभगत की आशंका भी जताई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार गौरेला स्थित 100 सीटर छात्रावास में प्रभारी अधीक्षक के रूप में कार्यरत व्याख्याता श्रीमती ममता द्विवेदी लंबे समय से अपनी मूल संस्था हाई स्कूल हर्राटोला में उपस्थित नहीं हो रही हैं। आरोप है कि विद्यालय में अध्यापन कार्य किए बिना ही उन्हें नियमित वेतन भुगतान किया जा रहा है।
गौरतलब है कि हाल ही में जिला कलेक्टर द्वारा जिले के तीनों विकासखंड शिक्षा अधिकारियों (BEO) को स्पष्ट निर्देश जारी किए गए थे कि 100 सीटर छात्रावासों में पदस्थ प्रभारी अधीक्षकों का अप्रैल माह का वेतन तभी जारी किया जाए, जब वे अपनी मूल संस्था के प्राचार्य या प्रधान पाठक से कम से कम दो कालखंड अध्यापन कार्य कराने का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करें।
हालांकि जमीनी स्थिति इन आदेशों से बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है।
जानकारी के मुताबिक मरवाही, पेंड्रा और गौरेला विकासखंड के कई छात्रावासों में पदस्थ प्रभारी अधीक्षिकाएं नियमित रूप से स्कूल नहीं पहुंच रही हैं। इनमें मरवाही 100 सीटर छात्रावास की प्रभारी अधीक्षक भुवनेश्वरी मार्को (मूल संस्था – पूर्व माध्यमिक शाला पंडरी) तथा पेंड्रा विकासखंड अंतर्गत कोडगार छात्रावास की प्रभारी अधीक्षक संतोषी एक्का के नाम भी चर्चा में हैं। आरोप है कि ये अधीक्षिकाएं केवल छात्रावास संचालन तक सीमित हैं और विद्यालयों में अध्यापन कार्य कराने नहीं पहुंचतीं।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब ये छात्रावास स्वयं शिक्षा विभाग और जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के अधीन संचालित हैं, तो आखिर विभाग अपने ही कर्मचारियों से शासन के आदेशों का पालन क्यों नहीं करा पा रहा? क्या विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) और जिला शिक्षा अधिकारी स्तर पर आदेशों को नजरअंदाज किया जा रहा है, या फिर अंदरखाने कोई ऐसा संरक्षण तंत्र सक्रिय है जिसके चलते वर्षों से स्कूल से अनुपस्थित रहने के बावजूद वेतन भुगतान जारी है?
मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि एक ओर शासन शिक्षा गुणवत्ता सुधार और स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए सख्त निर्देश जारी कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार अधिकारी अपने ही विभागीय कर्मचारियों पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं। इसका सीधा असर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
यदि कलेक्टर के स्पष्ट आदेश के बावजूद बिना अध्यापन प्रमाण पत्र के वेतन जारी हुआ है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि वित्तीय नियमों के उल्लंघन का मामला भी बन सकता है।




