मरवाही वनमंडल में ‘बाबू राज’! 10 साल से जमे कर्मचारियों पर मेहरबानी:आधा दर्जन DFO बदले, लेकिन ‘चुनिंदा बाबू’ जस के तस; नियमों की अनदेखी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही(छत्तीसगढ़ उजाला)
मरवाही वनमंडल में इन दिनों “बाबू राज” चरम पर नजर आ रहा है। आरोप है कि डीएफओ कार्यालय में कुछ लिपिक वर्गीय कर्मचारी पिछले 10 वर्षों से एक ही शाखा में जमे हुए हैं। हैरानी की बात यह है कि इस दौरान आधा दर्जन से ज्यादा DFO बदले, लेकिन इन कर्मचारियों की कुर्सी नहीं हिली।
सूत्र बताते हैं कि इन कर्मचारियों को पूर्व से लेकर वर्तमान DFO तक का “विशेष संरक्षण” प्राप्त है, जिसके चलते सामान्य प्रशासन के नियम और ट्रांसफर आदेश भी बेअसर साबित हो रहे हैं।
कैम्पा शाखा बना ‘स्थायी अड्डा’?
आरोप है कि भुपेंद्र साहू नामक कर्मचारी पिछले 10 वर्षों से कैम्पा शाखा में ही जमे हुए हैं। प्रमोशन के बाद भी उन्हें वहीं का प्रभारी बना दिया गया।
बताया जाता है कि उन्हें हटाने के लिए 6 से अधिक बार आदेश जारी हुए, लेकिन एक भी आदेश जमीनी स्तर पर लागू नहीं हो सका। इससे विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
इतना ही नहीं, इस कर्मचारी पर गोबर खरीदी में फर्जीवाड़ा और कूटरचना जैसे गंभीर आरोप भी लगे हैं, जिनकी गूंज विधानसभा तक पहुंच चुकी है—फिर भी कार्रवाई शून्य है।
मुख्य लिपिक पद पर भी ‘सेटिंग’ का खेल?
शैल गुप्ता के मामले में भी नियमों को दरकिनार करने के आरोप सामने आए हैं। सहायक ग्रेड-2 रहते हुए वे वर्षों तक व्यय-1 शाखा में पदस्थ रहीं और प्रमोशन के बाद भी उसी वनमंडल में मुख्य लिपिक के पद पर बनी रहीं।
सूत्रों का दावा है कि समिति से राशि आहरण की अनुमति में भारी अनियमितताएं हुईं। यहां तक कि सुरक्षा निधि के नाम पर फर्जी प्रस्ताव बनाकर पैसों का दुरुपयोग किए जाने के आरोप भी लगे हैं।
वर्तमान में उनके पास मुख्य लिपिक के साथ-साथ व्यय-1 शाखा का भी प्रभार है — यानी एक ही जगह 10 साल से“डबल पावर”!
सवाल बड़ा है…
आखिर क्यों 10 साल से जमे कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं?
क्यों ट्रांसफर आदेश सिर्फ फाइलों में दबकर रह जाते हैं?
क्या “अंदरखाने की सेटिंग” प्रशासन पर भारी पड़ रही है?
अब निगाहें DFO पर
मरवाही वनमंडल में उठते इन गंभीर आरोपों के बीच अब सबकी नजर DFO पर टिकी है। देखना होगा कि वे कब तक इन मामलों पर ठोस कार्रवाई करते हैं या फिर “बाबू राज” यूं ही चलता रहेगा..?



