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संस्कारधानी में सजा काव्य का गंगोत्सव: ‘गंगांजलि’ साझा संग्रह का भव्य लोकार्पण


जबलपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-साहित्य, समाज और संस्कृति को समर्पित शहर की सक्रिय संस्था सशक्त हस्ताक्षर संस्था के तत्वावधान में साझा काव्य संग्रह ‘गंगांजलि’ का भव्य लोकार्पण समारोह गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। संस्कारधानी जबलपुर स्थित नूतन मराठी स्कूल गोलबाजार के प्रांगण में 14 फरवरी 2026 को आयोजित काव्य गोष्ठी में साहित्य प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि माधुरी मिश्रा (निदेशक, गूंज) रहीं, जबकि अध्यक्षता महामहोपाध्याय हरिशंकर दुबे ने की। सारस्वत अतिथि के रूप में राजेश पाठक ‘प्रवीण’ एवं मंगलभाव, कवि संगम त्रिपाठी की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को विशेष आयाम प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन संस्था के संस्थापक गणेश श्रीवास्तव ‘प्यासा जबलपुरी’ ने प्रभावी शैली में किया।
भावनाओं का काव्य-संगम है ‘गंगांजलि’
‘गंगांजलि’ साझा काव्य संग्रह के संपादक डॉ. अजय शुक्ल हैं। इस संग्रह में देश के विभिन्न अंचलों के रचनाकारों की सशक्त काव्यधारा समाहित है। जबलपुर (मध्यप्रदेश) के हास्य-व्यंग्य कवि संगम त्रिपाठी, बुरहानपुर के कवि-लेखक पंकज बुरहानपुरी, लखनऊ (गोमती नगर) के कवि-गीतकार श्याम फतनपुरी तथा प्रयागराज के कवि-लेखक डॉ. सोमनाथ शुक्ल की रचनाएँ इसमें संग्रहित हैं। संग्रह को भावनाओं का जीवंत काव्य-संगम बताया गया, जिसमें संवेदना, समाज और संस्कार की विविध धाराएँ एक साथ प्रवाहित होती हैं।
काव्य पाठ से गूंजा प्रांगण
लोकार्पण अवसर पर आयोजित काव्य गोष्ठी में अर्चना गोस्वामी, सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’, विजय सिन्हा, आशा मालवीय, अमरनाथ सोनी, वाई.के. मालवीय, लखन लाल रजक, प्रकाश सिंह ठाकुर, मदन श्रीवास्तव, जी.एल. जैन, तरुणा खरे, डॉ. अरुणा पांडेय, इंद्रसिंह राजपूत ‘इन्द्राना’, ज्योति ‘प्यासी’, दिवाकर शर्मा, महेश स्थापक, वरुण शर्मा, संतोष नेमा ‘संतोष’, सहेन्द्र श्रीवास्तव, सुरेन्द्र लाल साहू ‘निर्विकार’, आरती श्रीवास्तव, अरुण शुक्ल, अमर सिंह वर्मा, श्रीमती प्रतिक्षा सेठी एवं श्रीमती उर्मिला श्रीवास्तव की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम के अंत में अतिथियों ने साहित्यिक गतिविधियों को समाज की चेतना से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए ‘सशक्त हस्ताक्षर’ संस्था के प्रयासों की सराहना की। समारोह ने एक बार फिर सिद्ध किया कि जबलपुर की साहित्यिक धरती पर सृजन की गंगा निरंतर प्रवाहित हो रही है।

प्रशांत गौतम

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