दिल्ली में गूंजा छत्तीसगढ़ का ‘जल मंत्र’: पीएम मोदी ने सराहा मॉडल, हर राज्य के लिए ‘कैच द रेन प्लान’ का सुझाव

19 क्रिटिकल ब्लॉक से शून्य तक का सफर बना मिसाल, राष्ट्रीय मंच पर चमका छत्तीसगढ़ का जल संरक्षण मॉडल
रायपुर/नई दिल्ली(छत्तीसगढ़ उजाला)-पानी बचाने की बात अब केवल नारों और कागजी योजनाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। हर राज्य की अपनी भौगोलिक परिस्थितियों, जमीन की प्रकृति, जल उपलब्धता और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप अलग जल संरक्षण रणनीति बननी चाहिए। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने नई दिल्ली के राष्ट्रीय मंच से यही संदेश दिया, जिसे सम्मेलन में विशेष सराहना मिली।
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के ‘डिपार्टमेंटल समिट ऑन वॉटर’ में छत्तीसगढ़ की प्रस्तुति ने राष्ट्रीय स्तर पर खास ध्यान आकर्षित किया। नई दिल्ली स्थित सुषमा स्वराज भवन में आयोजित समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुले मंच से छत्तीसगढ़ की प्रस्तुति की सराहना की। देश के चुनिंदा राज्यों की प्रस्तुतियों के बीच छत्तीसगढ़ के जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण मॉडल को विशेष रूप से सराहा गया।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने करीब 30 मिनट की प्रस्तुति में प्रदेश में जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और जनभागीदारी से जुड़े कार्यों की विस्तृत तस्वीर सामने रखी। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल, विभिन्न राज्यों के मंत्री, सचिव और प्रतिनिधिमंडलों के सामने छत्तीसगढ़ ने यह संदेश दिया कि यदि सरकार की नीति, विभागीय क्रियान्वयन और जनता की भागीदारी एक साथ हो तो जल संरक्षण को वास्तविक जनआंदोलन बनाया जा सकता है।
19 क्रिटिकल ब्लॉक से शून्य तक का सफर
छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी उपलब्धि भूजल संकट से जुड़े आंकड़ों में दिखाई देती है। प्रदेश में एक समय 19 क्रिटिकल ब्लॉक थे, लेकिन लगातार जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण के प्रयासों के बाद इनकी संख्या शून्य तक पहुंचने की बात राष्ट्रीय मंच पर प्रमुखता से रखी गई।
यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ के लिए केवल आंकड़ों की सफलता नहीं, बल्कि जल संरक्षण के क्षेत्र में लगातार किए गए प्रयासों का परिणाम मानी जा रही है।
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि इसे जन आंदोलन का स्वरूप देना होगा। किसान परिवार से आने वाले मुख्यमंत्री ने अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि पानी की वास्तविक कीमत वही बेहतर समझता है, जिसका सीधा संबंध खेत, फसल और खेती से रहा हो।
प्रदेश में इसी सोच के साथ जल संरक्षण को केवल सरकारी योजना के रूप में नहीं, बल्कि गांव, किसान और समाज की भागीदारी से जोड़ने का प्रयास किया गया।
साय का विजन, अरुण साव की प्रस्तुति और विभागीय टीम का क्रियान्वयन
समिट के ‘कैच द रेन’ सत्र में उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, पेयजल स्रोतों की सुरक्षा और विभिन्न योजनाओं के तहत किए जा रहे कार्यों की विस्तृत जानकारी दी।
इस दौरान मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह भी उपस्थित रहे। वहीं जल संसाधन विभाग के सचिव राजेश कुमार टोप्पो, आईएएस के नेतृत्व में विभागीय टीम द्वारा जल संरक्षण के मॉडल को जमीन पर उताने के प्रयासों का प्रभाव अब राष्ट्रीय मंच पर दिखाई दे रहा है।
मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह, जल संसाधन विभाग सचिव राजेश कुमार टोप्पो सहित संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी ने यह स्पष्ट किया कि जल संरक्षण की सफलता किसी एक विभाग या व्यक्ति का काम नहीं, बल्कि नीति, समन्वय और प्रभावी क्रियान्वयन का संयुक्त परिणाम है।
संदेश साफ था—जब सरकार की नीति, प्रशासनिक समन्वय और जनभागीदारी एक दिशा में काम करें तो पानी बचाने की मुहिम फाइलों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जमीन पर परिणाम दिखाई देते हैं।
आंकड़े बता रहे हैं जल संरक्षण की सफलता की कहानी
‘जल शक्ति अभियान—कैच द रेन’ के विभिन्न चरणों में छत्तीसगढ़ ने बड़े पैमाने पर जल संरचनाओं के निर्माण और संरक्षण का काम किया।
बताया गया कि जेएसबी 1.0 के दौरान प्रदेश में 4,05,561 जल संरचनाएं बनाईं गईं, जिसके आधार पर छत्तीसगढ़ ने देश में दूसरा स्थान हासिल किया।
वहीं जेएसबी 2.0 में प्रदेश में 24,07,768 जल संरचनाओं का निर्माण किया गया। इस चरण में छत्तीसगढ़ के 5 जिले देश के टॉप-10 जिलों में शामिल हुए।
‘कैच द रेन’ अभियान में भी छत्तीसगढ़ के प्रदर्शन को उल्लेखनीय बताया गया और प्रदेश ने देश में नंबर-1 स्थान दर्ज किया।
कोरिया का ‘5 प्रतिशत मॉडल’ बना राष्ट्रीय मिसाल
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले का ‘5 प्रतिशत मॉडल’ भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना।
इस मॉडल के तहत किसान स्वेच्छा से अपनी भूमि का 5 प्रतिशत हिस्सा जल पुनर्भरण संरचनाओं के लिए उपलब्ध कराने की दिशा में भागीदारी कर रहे हैं। जल संरक्षण में किसानों और स्थानीय समुदाय की इस सीधी भागीदारी ने अभियान को केवल सरकारी योजना न रखकर सामाजिक आंदोलन का स्वरूप देने में मदद की है।
प्रदेश में 100 प्रतिशत जिलों की भागीदारी के साथ ‘कैच द रेन’ अभियान को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया गया है।
हर राज्य बनाए अपना अलग ‘कैच द रेन प्लान’
राष्ट्रीय मंच से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने एक महत्वपूर्ण सुझाव भी रखा। उन्होंने कहा कि देश के हर राज्य की भौगोलिक स्थिति, वर्षा का पैटर्न, भूजल स्तर और जल संबंधी जरूरतें अलग हैं। ऐसे में सभी राज्यों के लिए एक जैसी रणनीति पर्याप्त नहीं हो सकती।
मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि हर राज्य अपना अलग ‘कैच द रेन प्लान’ तैयार करे, जिसमें स्थानीय परिस्थितियों और जल आवश्यकताओं के अनुसार स्पष्ट रोडमैप बनाया जाए।
उन्होंने अभियान की नियमित समीक्षा पर भी जोर देते हुए कहा कि राज्य स्तर पर इसकी प्रगति की निरंतर निगरानी होनी चाहिए और मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हर तीन महीने में समीक्षा बैठक आयोजित की जा सकती है।
मुख्यमंत्री के इन सुझावों को सम्मेलन में विशेष सराहना मिली। राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ के मॉडल को अन्य राज्यों तक पहुंचाने और उसे समझने की दिशा में भी चर्चा सामने आई।
अब अगली चुनौती—हर बूंद का हिसाब और संरचनाओं की स्थायित्व
जल संरक्षण के क्षेत्र में उपलब्धियां दर्ज करने के बाद अब अगली चुनौती और बड़ी है।
राष्ट्रीय स्तर पर 31 मई 2027 तक 2 करोड़ नई जल संरचनाएं तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। छत्तीसगढ़ भी इस लक्ष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की तैयारी में है।
लेकिन आने वाले समय की असली परीक्षा केवल नई संरचनाएं बनाने की नहीं होगी। चुनौती यह होगी कि बनाई गई जल संरचनाएं लंबे समय तक उपयोगी रहें, उनका रखरखाव हो और स्थानीय जरूरतों के अनुसार उनका प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जाए।
जल बजट, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजना, ग्राम पंचायतों की भागीदारी और विभागीय जवाबदेही अब जल संरक्षण के अगले चरण के महत्वपूर्ण आधार होंगे।
दिल्ली की सराहना केवल प्रस्तुति की सफलता नहीं
दिल्ली के राष्ट्रीय मंच पर मिली सराहना को केवल एक प्रस्तुति की सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह उस संयुक्त प्रयास की पहचान है, जिसमें मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का विजन, उपमुख्यमंत्री अरुण साव की सक्रिय भागीदारी, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह का प्रशासनिक समन्वय और जल संसाधन विभाग सचिव राजेश कुमार टोप्पो के नेतृत्व में विभागीय टीम का क्रियान्वयन एक साथ दिखाई देता है।
छत्तीसगढ़ ने पानी बचाने की कहानी केवल कागजों में नहीं लिखी, बल्कि उसे राष्ट्रीय मंच पर एक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया है।
यदि जल संरक्षण की यह रफ्तार और जनभागीदारी आगे भी इसी तरह बनी रही तो आने वाले समय में देश की जल नीति और जल संरक्षण से जुड़ी बहसों में छत्तीसगढ़ की आवाज और अधिक बुलंद सुनाई दे सकती है।
दिल्ली के मंच से निकला संदेश साफ है—पानी बचाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की साझी जिम्मेदारी है। और छत्तीसगढ़ अब इस जिम्मेदारी को राष्ट्रीय मॉडल के रूप में सामने रखने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है।



