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कोरबा में कुदरत का अलार्म! भारी बारिश के बीच सड़क पर उतरा पहाड़, लैंडस्लाइड ने बढ़ाई चिंता; क्या बेतहाशा कोयला उत्खनन का दिखने लगा खतरनाक असर?

काले हीरे की धरती पर पानी का सैलाब और मिट्टी का मलबा… सर्वमंगला-कांबेरी मार्ग पर लैंडस्लाइड, दादर नाला में बहती स्कॉर्पियो से 3 लोगों का ग्रामीणों ने किया रेस्क्यू

कोरबा(छत्तीसगढ़ उजाला)-छत्तीसगढ़ में बारिश इस बार सिर्फ पानी नहीं बरसा रही, बल्कि कई इलाकों में खतरे की घंटी भी बजाती नजर आ रही है। प्रदेश के कई हिस्सों में लगातार हो रही बारिश ने पुराने रिकॉर्ड पीछे छोड़ने शुरू कर दिए हैं। मौसम विभाग ने आधा दर्जन जिलों के लिए ऑरेंज और येलो अलर्ट जारी किया है। राज्य सरकार और प्रशासन भी हालात पर नजर बनाए हुए हैं। इसी बीच काले हीरे की धरती कोरबा से आई एक तस्वीर ने पर्यावरण और भविष्य की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कोरबा के सर्वमंगला से कांबेरी जाने वाले मुख्य मार्ग पर लैंडस्लाइड की घटना सामने आई है। भारी बारिश के बीच पहाड़ी और ढलान वाले इलाके से मिट्टी, पत्थर और मलबा सड़क पर आ गया। सड़क पर पानी का तेज बहाव और मलबा देखकर लोगों को पहाड़ी राज्यों में होने वाली लैंडस्लाइड की घटनाओं की याद आ गई।

यह घटना महज एक सड़क पर मलबा आने की घटना मानकर नजरअंदाज नहीं की जा सकती। कोरबा देश के सबसे बड़े कोयला उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है और यहां लंबे समय से बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियां जारी हैं। ऐसे में लगातार बारिश के बीच मिट्टी खिसकने की घटना ने खनन, पर्यावरणीय असंतुलन और भविष्य के खतरे को लेकर बहस छेड़ दी है।

सर्वमंगला-कांबेरी मार्ग पर अचानक खिसकी मिट्टी

ताजा जानकारी के मुताबिक सर्वमंगला से कांबेरी जाने वाले मुख्य मार्ग पर अचानक लैंडस्लाइड होने से बड़ी मात्रा में मिट्टी, मलबा और पत्थरों के टुकड़े सड़क पर आ गिरे। बारिश के कारण इलाके में पानी का बहाव भी तेज रहा, जिससे आवागमन प्रभावित हुआ।

स्थानीय लोगों के मुताबिक कोरबा जिले में पिछले कई दिनों से लगातार बारिश हो रही है। पहाड़ी और ढलान वाले क्षेत्रों में जमीन के खिसकने का खतरा बढ़ गया है। यदि बारिश का सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो ऐसे क्षेत्रों में हालात और गंभीर हो सकते हैं।

दादर नाला में उफान, स्कॉर्पियो बही… ग्रामीणों ने बचाई 3 जिंदगियां

इसी बीच दादर नाला इलाके से भी एक खतरनाक वीडियो सामने आया है। उफनते नाले के बीच एक स्कॉर्पियो वाहन चालक वाहन लेकर आगे बढ़ता रहा। ग्रामीणों ने उसे रोकने और खतरे से आगाह करने की कोशिश की, लेकिन वाहन आगे बढ़ता गया।

कुछ ही देर में तेज बहाव के बीच स्कॉर्पियो अपना नियंत्रण खो बैठी और पानी में बहने लगी। मौके पर मौजूद ग्रामीणों ने तत्परता दिखाते हुए ड्राइवर समेत वाहन में सवार तीन लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला।

स्थानीय लोगों का दावा है कि वाहन चालक नशे की हालत में था। हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद इलाके में इसकी चर्चा तेज है।

सड़कों पर सैलाब, गांवों में जलभराव… आखिर बदल क्या रहा है?

कोरबा जिले के छोटे-बड़े गांवों और कस्बों में जलभराव की समस्या लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन इलाकों में बारिश का पानी पहले आसानी से निकल जाता था, वहां अब भारी जलभराव की स्थिति बन रही है।

सड़कों और आसपास के इलाकों में जगह-जगह बने गड्ढे भी लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं। निचली बस्तियों में रहने वाले लोगों के लिए लगातार बढ़ता जलस्तर चिंता का विषय बनता जा रहा है।

ऐसे हालात के बीच लैंडस्लाइड की घटना ने लोगों की बेचैनी और बढ़ा दी है।

कोरबा में देश की बड़ी कोयला खदानें, अब पर्यावरणीय दबाव भी बड़ा सवाल

कोरबा को देश की प्रमुख कोयला नगरी के रूप में जाना जाता है। जिले में दीपका, गेवरा, कुसमुंडा और कोरबा जैसे प्रमुख कोयला क्षेत्र हैं। इनमें गेवरा, दीपका और कुसमुंडा जैसी खदानें देश की बड़ी कोयला खदानों में गिनी जाती हैं।

कोयला उत्पादन ने कोरबा को देश की ऊर्जा व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। जिले में स्थापित पावर प्लांटों से बड़ी मात्रा में बिजली का उत्पादन होता है और इसकी आपूर्ति छत्तीसगढ़ के साथ-साथ दूसरे राज्यों तक भी होती है।

लेकिन विकास और ऊर्जा की इस बड़ी तस्वीर के पीछे पर्यावरणीय कीमत को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

खनन बढ़ा तो जंगल, जमीन और जलस्रोतों पर भी बढ़ा दबाव

कोरबा में लंबे समय से जारी कोयला उत्खनन के चलते बड़े पैमाने पर जमीन का इस्तेमाल, जंगलों पर दबाव, धूल और प्रदूषण जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं। पावर प्लांटों से निकलने वाली राख और औद्योगिक गतिविधियों का प्रभाव भी जल, जंगल और जमीन पर पड़ने को लेकर चिंता जताई जाती रही है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी क्षेत्र में प्राकृतिक ढलानों, जल निकासी तंत्र और हरित क्षेत्र में लगातार बदलाव होने पर अत्यधिक बारिश के दौरान जोखिम बढ़ सकता है। ऐसे में कोरबा में सामने आई लैंडस्लाइड की घटना को सिर्फ बारिश का असर मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।

क्या अनियंत्रित उत्खनन ने प्रकृति का संतुलन बिगाड़ दिया?

कोरबा कोयला क्षेत्र में लंबे समय से खनन का विस्तार हो रहा है। इसी विस्तार के बीच यह सवाल भी उठता रहा है कि क्या उत्पादन बढ़ाने की होड़ में पर्यावरणीय संतुलन की पर्याप्त चिंता की जा रही है?

क्षमता से अधिक उत्खनन, जंगलों की कटाई, जमीन की संरचना में बदलाव और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था पर पड़ने वाला प्रभाव—इन तमाम पहलुओं की वैज्ञानिक और प्रशासनिक स्तर पर समीक्षा जरूरी है।

कोरबा में सामने आई लैंडस्लाइड इस बहस को और गंभीर बना रही है।

कोयला उत्पादन का कीर्तिमान कहीं अभिशाप न बन जाए!

कोरबा की पहचान देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाले महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में है। यहां से निकलने वाला कोयला बिजली उत्पादन और औद्योगिक गतिविधियों की बड़ी जरूरत पूरी करता है।

लेकिन यदि इसी विकास के साथ प्रदूषण, जंगलों की कटाई, जलस्रोतों पर दबाव, जमीन का क्षरण और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी बढ़ता गया तो आने वाले समय में यही उपलब्धियां सवालों के घेरे में आ सकती हैं।

आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कोरबा में कितनी बारिश हुई और सड़क पर कितना मलबा आया।

बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रकृति अब उस विकास का हिसाब मांग रही है, जिसकी कीमत लगातार जंगल, जमीन, पानी और हवा चुका रहे हैं?

बारिश ने बजाई खतरे की घंटी, अब प्रशासन को करना होगा गंभीर मंथन

छत्तीसगढ़ में पिछले दो सप्ताह से कभी रुक-रुककर तो कभी मूसलाधार बारिश हो रही है। कई जिलों में भारी बारिश के कारण नदी-नाले उफान पर हैं और निचले इलाकों में जलभराव की स्थिति बनी हुई है।

मौसम विभाग के अलर्ट के बीच SDRF, NDRF और स्थानीय प्रशासन की तैयारियों पर भी नजरें टिकी हैं।

कोरबा में लैंडस्लाइड और दादर नाला में वाहन बहने की घटना ने साफ कर दिया है कि भारी बारिश के दौरान सिर्फ बाढ़ ही नहीं, बल्कि भूस्खलन, सड़क धंसने और जलभराव जैसे खतरे भी तेजी से बढ़ सकते हैं।

जरूरत अब इस बात की है कि प्रशासन तत्काल प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण करे, संवेदनशील ढलानों और खनन प्रभावित इलाकों की वैज्ञानिक जांच कराए और यह सुनिश्चित करे कि कोरबा का औद्योगिक विकास प्रकृति की सुरक्षा की कीमत पर न हो।

क्योंकि सवाल अब सिर्फ आज की सड़क और आज के मलबे का नहीं है।

सवाल कोरबा के आने वाले कल का है।

 

प्रशांत गौतम

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