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पुलिस भर्ती की दूसरी प्रतीक्षा सूची पर संग्राम: नौकरी की मांग अब सियासी अखाड़े में तब्दील, युवाओं के कंधे पर सियासत की बंदूक तो कहीं गुस्से में अपनी ही दावेदारी कमजोर तो नहीं कर रहे अभ्यर्थी?

बात बेबाक

चंद्र शेखर शर्मा (पत्रकार)

सरकार से सवाल जरूरी, लेकिन विपक्ष से भी पूछना होगा हिसाब; आंदोलन हक की लड़ाई रहे, किसी दल की राजनीतिक रोटी सेंकने का मंच नहीं

लंबे इंतजार के बाद निकली पुलिस भर्ती शुरू से ही विवादों के घेरे में रही है। चयन सूची और पहली प्रतीक्षा सूची में जगह बनाने से चूक गए अभ्यर्थी अब दूसरी प्रतीक्षा सूची जारी होने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। वर्दी पहनने का सपना आंखों में लिए ये युवा लगातार दूसरी सूची जारी करने की मांग कर रहे हैं और इसी मांग को लेकर छोटे-छोटे अंतराल में आंदोलन भी करते आ रहे हैं।

लेकिन सवाल अब सिर्फ इतना नहीं है कि दूसरी सूची निकलेगी या नहीं। सवाल यह भी है कि नौकरी की मांग का यह आंदोलन आखिर किस दिशा में जा रहा है?

शुरुआत नौकरी से हुई थी, लेकिन अब आंदोलन में आक्रोश, तीखी भाषा, राजनीतिक दखल और टकराव का रंग भी दिखाई देने लगा है। विपक्ष को सरकार को घेरने के लिए मुद्दा चाहिए था और बेरोजगार युवाओं का यह आंदोलन उसे तैयार मुद्दे के रूप में मिल गया।

युवाओं के कंधे पर बंदूक रखकर सरकार पर निशाना साधना राजनीति की कोई नई कला नहीं है।

सत्ता पक्ष से सवाल होना चाहिए। सरकार को जवाब देना चाहिए। लेकिन विपक्ष से भी सवाल होना चाहिए—जब आपकी सरकारें थीं, तब बेरोजगार युवाओं के सपनों और आंसुओं का हिसाब कौन रखता था?

बेरोजगार युवा किसी राजनीतिक दल के पोस्टर का चेहरा नहीं हैं। वे किसी पार्टी की राजनीतिक संपत्ति नहीं हैं। वे व्यवस्था की जिम्मेदारी हैं।

युवाओं को भी समझना होगा कि राजनीतिक दलों के लिए उनका आंदोलन राजनीति का जरिया बन सकता है। नौकरी मिले तो श्रेय लेने की राजनीति और नौकरी न मिले तो सरकार के खिलाफ आंदोलन—दोनों परिस्थितियों में फायदा राजनीतिक दलों का ही है।

लेकिन नुकसान किसका होगा? उसी युवा का, जिसने अपनी उम्र, मेहनत और उम्मीद इस भर्ती में लगा दी है।

हक की लड़ाई में भाषा की सीमा क्यों टूट रही है?

दूसरी प्रतीक्षा सूची की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब नौकरी से आगे बढ़कर भाषा, मर्यादा और आंदोलन के तौर-तरीकों तक पहुंच गया है।

तीखे शब्द-बाण, अपशब्द, आक्रोश से भरी रील्स, आरोप-प्रत्यारोप और गृहमंत्री के काफिले की गाड़ी को उनके ही कार्यालय परिसर में रोकने और घेरने जैसी घटनाएं आंदोलन की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है।

सरकार से सवाल करने का अधिकार है।

धरना देने का अधिकार है।

अपनी मांग के लिए आवाज बुलंद करने का अधिकार है।

लेकिन किसी की आवाजाही रोक देना आंदोलन की ताकत नहीं, बल्कि उसकी सीमा पार करने का संकेत है।

गृहमंत्री को गाड़ी छोड़कर जाना पड़ा। इसे आंदोलन की जीत कहा जाए या व्यवस्था की मजबूरी—इसका फैसला जनता करेगी।

लेकिन लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना उपलब्धि है, रास्ता रोकना नहीं।

आंदोलन की ताकत तर्क में होती है, गाली में नहीं।

संख्या में होती है, दबाव में नहीं।

अनुशासन में होती है, अराजकता में नहीं।

जिस वर्दी के लिए लड़ रहे हैं, क्या उसके लायक संयम भी दिखा रहे हैं?

गुस्सा समझ में आता है। बेरोजगारी का दर्द समझ में आता है। वर्षों की मेहनत के बाद चयन से चूकने की पीड़ा भी समझ में आती है।

लेकिन जब गुस्से में शब्दों का ब्रेक फेल हो जाए, तब एक सवाल उठना स्वाभाविक है—

क्या पुलिस की वर्दी सिर्फ दौड़, ऊंची छलांग और लिखित परीक्षा पास करने से मिलती है?

नहीं।

पुलिस की नौकरी का सबसे बड़ा हिस्सा है—गुस्से में भी संयम।

कल यही युवा पुलिस की वर्दी पहनेंगे। कल इन्हीं के सामने कोई आक्रोशित नागरिक खड़ा होगा। कोई गुस्से में बोलेगा, कोई व्यवस्था को कोसेगा, कोई पुलिस पर सवाल उठाएगा।

तब पुलिसकर्मी को क्या करना होगा?

गुस्से का जवाब गुस्से से नहीं, कानून और संयम से देना होगा।

इसलिए आज का आंदोलन सिर्फ भर्ती प्रक्रिया की परीक्षा नहीं है। यह उन युवाओं के धैर्य, अनुशासन और संयम की परीक्षा भी है, जो कल कानून-व्यवस्था संभालने का सपना देख रहे हैं।

मंत्री जमीन पर, युवा जमीन पर… फिर समाधान फाइलों में क्यों?

आंदोलनरत युवाओं के बीच उपमुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री विजय शर्मा का जमीन पर बैठकर अभ्यर्थियों से लगातार संवाद करना निश्चित रूप से सहजता और संवेदनशीलता की तस्वीर पेश करता है।

सरकार का मंत्री जमीन पर है।

अभ्यर्थी जमीन पर हैं।

दोनों अपनी-अपनी बात पर कायम हैं।

तस्वीर लोकतंत्र के लिए अच्छी लगती है।

लेकिन तस्वीर का सबसे बड़ा सवाल यही है—

मंत्री जमीन पर, युवा जमीन पर… समाधान आखिर कहां है?

शायद किसी सरकारी फाइल में कुर्सी पर बैठा है।

गृहमंत्री ने दूसरी सूची को लेकर नियम क्या हैं, कितने पद हैं, प्रक्रिया क्या है और निर्णय किस आधार पर होगा—इन सवालों पर अपना पक्ष रखने का प्रयास किया है। बावजूद इसके यदि अभ्यर्थी संतुष्ट नहीं हैं तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पूरी प्रक्रिया को और अधिक स्पष्ट एवं पारदर्शी तरीके से सामने रखे।

क्योंकि आंदोलन जितना लंबा होगा, भ्रम उतना बढ़ेगा और भ्रम जितना बढ़ेगा, राजनीति के लिए उतनी ही ज्यादा जगह बनेगी।

जमीन पर बैठकर संवाद अच्छी शुरुआत है, लेकिन समाधान तब होगा जब दोनों पक्ष उठने से पहले कोई रास्ता निकालें।

अभ्यर्थियों से एक बेबाक सवाल—हक मांग रहे हैं या अपना ही पक्ष कमजोर कर रहे हैं?

दूसरी प्रतीक्षा सूची की मांग कीजिए।

पूरी ताकत से कीजिए।

सरकार से सवाल कीजिए।

जवाब मांगिए।

लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन कीजिए।

लेकिन अपनी भाषा और मर्यादा को मत छोड़िए।

क्योंकि आज जिस वर्दी के लिए आंदोलन कर रहे हैं, कल उसी वर्दी में आपको समाज के गुस्से और आक्रोश का सामना करना होगा।

आज अगर आप गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं, तो कल दूसरों के गुस्से को कैसे नियंत्रित करेंगे?

और यही सबसे बड़ा आत्ममंथन है।

इसलिए दूसरी सूची जरूर मांगिए, लेकिन ऐसी भाषा में कि कल जब वही वर्दी आपके कंधे पर आए तो आपको अपने पुराने वीडियो देखकर खुद ही यह न कहना पड़े—

“साहब, उस समय हम बेरोजगार थे… दिमाग भी थोड़ा बेरोजगार था!”

सरकार भी सुने, विपक्ष भी समझे और युवा भी संभलें

सरकार को समझना होगा कि बेरोजगार युवा सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। उनके पीछे परिवार की उम्मीदें हैं, वर्षों की मेहनत है और भविष्य के सपने हैं।

यदि नियम दूसरी प्रतीक्षा सूची की अनुमति देते हैं तो रास्ता निकालिए।

यदि नियम अनुमति नहीं देते तो स्पष्ट कारण बताइए।

लेकिन अनिश्चितता को लंबा मत खींचिए।

वहीं विपक्ष को भी समझना होगा कि बेरोजगार युवाओं का आंदोलन राजनीतिक हथियार नहीं है।

युवाओं के कंधे पर हाथ रखिए, बंदूक मत रखिए

और युवाओं को भी समझना होगा कि आंदोलन उनका है, इसलिए उसकी मर्यादा की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है।

नौकरी के लिए लड़िए, लेकिन अपनी मर्यादा से मत लड़िए।

क्योंकि दूसरी प्रतीक्षा सूची निकले या न निकले, भर्ती हो या न हो—

चरित्र की सूची से नाम कट गया तो फिर कोई दूसरी सूची काम नहीं आएगी।

और अंत में…

किस मुँह से इल्ज़ाम लगाएँ, बारिश पर, बौछारों पर,हमने ख़ुद तस्वीर बनाई थी, कच्ची दीवारों पर।

 

प्रशांत गौतम

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