छत्तीसगढ

*सियासत*….. *मंत्री जी की कुर्सी और ओएसडी का ‘दरबार’!*। *जिसके नाम में ही राहु का वास…..उसकी वक्र दृष्टि से क्या मंत्री बच पाएंगे?*

मंत्री जी की कुर्सी, ओएसडी का ‘दरबार’!

पहली बार मंत्री बने माननीय पर उठते सवाल—महत्वपूर्ण विभाग में फैसलों की चाबी क्या एक अधिकारी के हाथ?

रायपुर छत्तीसगढ़ उजाला। साय मंत्रिमंडल में पहली बार मंत्री बनने का अवसर पाने वाले एक माननीय इन दिनों अपने काम से कम और अपने कथित रूप से बेहद प्रभावशाली ओएसडी को लेकर ज्यादा चर्चा में हैं। विभाग भी कोई सामान्य नहीं, बल्कि ऐसा महत्वपूर्ण विभाग है जिसका सीधा संबंध प्रदेश और देश के भविष्य को गढ़ने से है। मगर विभागीय गलियारों में इन दिनों सवाल कुछ यूं तैर रहा है—“मंत्री कौन है और चला कौन रहा है?”

सरकारी व्यवस्था में मंत्री के सहयोग के लिए ओएसडी की नियुक्ति कोई नई बात नहीं है। ओएसडी मंत्री के काम को आसान करे, फाइलों को व्यवस्थित करे और जरूरी मामलों में समन्वय बनाए—यह सामान्य व्यवस्था है। लेकिन यहां चर्चाएं कुछ अलग ही कहानी सुना रही हैं। आरोप हैं कि माननीय के विभाग में ओएसडी सहयोगी कम और सत्ता का कथित ‘पावर सेंटर’ अधिक बन गया है।

लगता है कि मंत्री पर राहु की वक्रदृष्टि पड़ गई है।अब इससे नए नवेले मंत्री का बच पाना मुश्किल ही होगा।राहु पैसा तो बहुत देता है।पर साथ ही अनैतिक कार्य पर दंड भी बड़ा देते है।अब कब तक इसका प्रतिकूल असर पड़ता है यह देखना बाकी है।ग्रहों की चाल का जीवन में असर भी अच्छा पड़ता है।

विभागीय गलियारों में चर्चा है कि ट्रांसफर की फाइल हो, सप्लाई से जुड़ा मामला हो या टेंडर से संबंधित कोई विषय—ओएसडी की कथित सहमति के बिना आगे बढ़ना मुश्किल है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना जरूरी है, लेकिन यदि इनमें सच्चाई है तो मामला प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल खड़ा करता है। साय सरकार की छवि ऐसे ओएसडी ही मटियामेट करने में लगे है।सूत्रों की बात पर भरोसा किया जाए तो अभी कुछ दिन पहले तबादले की एक लिस्ट जारी हुई थी इसमें तो ओएसडी लाल के साथ मालामाल भी हो गया है।अब इसकी सत्यता सरकार को जांचने की आवश्यकता है।

फोन की घंटी बजती रहे, साहब व्यस्त हैं!

ओएसडी महोदय की व्यस्तता के किस्से भी कम दिलचस्प नहीं बताए जाते। शिकायत करने वालों का कहना है कि फोन उठ जाए तो मानो सरकारी फाइल पर तत्काल आदेश हो गया! फोन बजता है, स्क्रीन चमकती है, लेकिन साहब की व्यस्तता शायद इतनी विराट है कि आम आदमी तो दूर, कई परिचितों को भी जवाब का इंतजार करना पड़ता है।

सबसे गंभीर चर्चा यह है कि मंत्री से जुड़े कुछ लोगों के बीच भी यह धारणा बन रही है कि अनेक मामलों में माननीय स्वयं निर्णय लेने के बजाय ओएसडी की राय पर अत्यधिक निर्भर हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि फाइलों पर हस्ताक्षर भी कथित तौर पर उसी सलाह के बाद होते हैं।

इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित मंत्री तथा ओएसडी का पक्ष सामने आना आवश्यक है। फिर भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि किसी मंत्री के बारे में ऐसी धारणा बन जाए कि विभागीय निर्णयों पर किसी गैर-निर्वाचित अधिकारी का असामान्य प्रभाव है, तो यह स्वयं मंत्री की राजनीतिक और प्रशासनिक छवि के लिए चिंता का विषय है।

विभाग है या ‘कृपा केंद्र’?

व्यंग्य में कहा जाए तो विभाग के बाहर नया बोर्ड लगाने की नौबत न आ जाए—“यहां काम नियमानुसार होता है,बस नियम जानने के लिए ओएसडी से संपर्क करें!”

लेकिन बात केवल हंसी-मजाक की नहीं है। ट्रांसफर और सरकारी खरीद-टेंडर जैसे मामलों में यदि किसी एक व्यक्ति के प्रभाव की शिकायतें लगातार सामने आती हैं, तो सरकार को पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए। आखिर फाइलें नियमों से चलनी चाहिए, किसी व्यक्ति की पसंद-नापसंद से नहीं।

मंत्री जी, अब कप्तानी भी कीजिए

पहली बार मंत्री बनना बड़ी जिम्मेदारी है। अधिकारी सलाह दे सकते हैं, सहयोग कर सकते हैं, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही अंततः मंत्री की होती है। महत्वपूर्ण विभाग में यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि कुर्सी किसी की है और नियंत्रण किसी दूसरे का।जनता ने बड़ा भरोसा करके आपको जिताया है।अब जनता से बात करने का भी समय आपके पास नहीं है। यहाँ भी आप ओएसडी की सलाह पर लोगों से मिलते हो।ऐसे में आपकी पारी एक ही बार की होगी।इस पर मनन कर लीजिए।

अंत में माननीय के लिए चार पंक्तियां—

कुर्सी मिली है जनसेवा की, खुद इसकी पतवार संभालिए,अफसर रखें सहयोग का रिश्ता, सत्ता उनको मत सौंप डालिए।

फाइल चले कानून से केवल, कृपा से कारोबार न हो,मंत्री आप हैं माननीय जी—ऐसा भी कुछ व्यवहार तो हो।

अब देखना यह है कि विभागीय गलियारों में चल रही इन चर्चाओं पर सरकार ध्यान देती है, मंत्री स्वयं व्यवस्था की कमान मजबूत करते हैं या फिर ओएसडी के कथित ‘दरबार’ की चर्चा यूं ही चलती रहती है।

Anil Mishra

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