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जिला अस्पताल की व्यवस्था पर फिर सवाल! गंभीर मरीज को बोले सिविल सर्जन—“मैं ड्यूटी में नहीं हूं, क्लिनिक ले जाइए”; CMHO ने फोन तक नहीं उठाया

पेंड्रा के पतगवा निवासी ग्रामीण की बिगड़ी हालत, परिजनों ने जिम्मेदार अधिकारियों से मांगी मदद; स्वास्थ्य विभाग की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही(छत्तीसगढ़ उजाला)-जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सवाल एक बार फिर खड़े हो गए हैं। पेंड्रा ब्लॉक के पतगवा निवासी एक ग्रामीण की तबीयत गंभीर होने के बाद परिजनों द्वारा जिला अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारियों से मदद मांगने का मामला सामने आया है। आरोप है कि मरीज की गंभीर हालत के बावजूद जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. देवेंद्र पैकरा ने मरीज को अस्पताल में देखने के बजाय कथित तौर पर कहा—“मैं ड्यूटी में नहीं हूं, क्लिनिक ले जाइए।”

मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि जिला अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारी ही गंभीर मरीज को तत्काल अस्पताल में देखने के बजाय निजी क्लिनिक जाने की सलाह दें, तो ग्रामीण मरीज आखिर किसके भरोसे इलाज कराए?

गंभीर मरीज, जिम्मेदार अधिकारी से संपर्क… लेकिन नहीं मिली मदद?

जानकारी के मुताबिक, पतगवा निवासी ग्रामीण की हालत बिगड़ने के बाद परिजनों ने जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. देवेंद्र पैकरा से संपर्क किया। परिजनों का आरोप है कि सिविल सर्जन ने अस्पताल पहुंचकर मरीज को देखने के बजाय खुद के ड्यूटी पर नहीं होने की बात कही और मरीज को क्लिनिक ले जाने की सलाह दी।

बताया जा रहा है कि इसी दौरान “मैं पार्टी में आया हूं” कहे जाने की बात भी सामने आई है। हालांकि इस कथन की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि परिजनों का आरोप सही है, तो गंभीर मरीज के समय पर इलाज और अस्पताल की व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

CMHO को फोन किया, लेकिन रिस्पॉन्स नहीं मिला!

मरीज के परिजनों ने जिला मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. रामेश्वर शर्मा से भी संपर्क करने की कोशिश की। आरोप है कि CMHO को फोन किया गया, लेकिन फोन रिसीव नहीं हुआ।

गंभीर मरीज के मामले में यदि परिजन जिले के स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष अधिकारियों से संपर्क कर रहे हों और उन्हें समय पर सहायता या मार्गदर्शन नहीं मिल पाए, तो यह स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही पर बड़ा सवाल है।

अरविंद सोनी प्रकरण के बाद फिर कटघरे में स्वास्थ्य विभाग

गौरतलब है कि जिले में NHM BPM अरविंद सोनी की दोबारा पेंड्रा पदस्थापना को लेकर पहले से ही स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं। अब जिला अस्पताल के सिविल सर्जन और CMHO से जुड़े इस नए मामले ने विभाग की कार्यशैली को फिर चर्चा में ला दिया है।

एक तरफ ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज बेहतर और तत्काल इलाज के लिए जिला अस्पताल का रुख करते हैं, वहीं दूसरी तरफ यदि उन्हें जिम्मेदार अधिकारियों से ही अपेक्षित मदद नहीं मिलती, तो स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मामले में कई सवाल सीधे स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही से जुड़े हैं—

गंभीर हालत में मरीज को जिला अस्पताल में तत्काल चिकित्सा सुविधा क्यों नहीं मिली?

सिविल सर्जन ने मरीज को अस्पताल में देखने के बजाय क्लिनिक जाने की सलाह क्यों दी?

उस समय सिविल सर्जन की वास्तविक ड्यूटी क्या थी और वे कहां मौजूद थे?

CMHO को फोन किए जाने के बावजूद संपर्क क्यों नहीं हो पाया?

क्या जिला अस्पताल में गंभीर मरीजों के लिए तत्काल जिम्मेदार चिकित्सकीय व्यवस्था उपलब्ध है?

मामले में सामने आए आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि घटना के समय सिविल सर्जन की ड्यूटी क्या थी, वे कहां मौजूद थे, मरीज की वास्तविक चिकित्सा स्थिति क्या थी और परिजनों को तत्काल उपचार उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए गए।

गंभीर मरीज के सामने यदि जिम्मेदार अधिकारी “ड्यूटी में नहीं हूं” कहकर किनारा कर लें और CMHO का फोन भी न उठे, तो सवाल सिर्फ एक मरीज का नहीं, बल्कि पूरी जिला स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही का है।

प्रशांत गौतम

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