छत्तीसगढ़ में क्या जनप्रतिनिधियों से ज्यादा ‘पावरफुल’ नौकरशाह? क्या कुछ अफसरों की मनमानी होगी बंद…… सांसद और नौकरशाह का विवाद पहुंचा दिल्ली…….
जनता चुनती है सरकार, लेकिन फैसलों पर अफसरशाही हावी हो जाए तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उठते हैं गंभीर सवाल
रायपुर•छत्तीसगढ़ उजाला
लोकतंत्र की बुनियाद बेहद स्पष्ट है—जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और चुनी हुई सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है। नौकरशाही का दायित्व सरकार की नीतियों और निर्णयों को कानून के दायरे में प्रभावी तरीके से लागू करना है। लेकिन जब व्यवस्था में ऐसी धारणा बनने लगे कि मंत्री और जनप्रतिनिधि पीछे हैं और अधिकारी आगे, तब सवाल केवल किसी एक मंत्री या अफसर का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी शासन-व्यवस्था के संतुलन का हो जाता है।
छत्तीसगढ़ में भी राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि आखिर सरकार में वास्तविक प्रभाव किसका है—जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों का या प्रशासन चलाने वाले नौकरशाहों का?यह प्रश्न गंभीर इसलिए है क्योंकि लोकतंत्र में अधिकारी चाहे कितना भी योग्य और वरिष्ठ क्यों न हो, नीतिगत नेतृत्व का अधिकार अंततः निर्वाचित सरकार के पास होता है।
जनता के बीच जनप्रतिनिधि, फाइलों पर अफसर
विधायक और मंत्री प्रतिदिन जनता के बीच रहते हैं। सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और स्थानीय समस्याओं को लेकर जनता सीधे अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल करती है। चुनाव के समय काम का हिसाब भी उन्हीं से मांगती है।दूसरी तरफ किसी योजना की प्रशासनिक स्वीकृति, बजट का क्रियान्वयन, निविदा, विभागीय आदेश और जमीनी अमल का बड़ा हिस्सा अधिकारियों के हाथों से गुजरता है।यहीं से संतुलन की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है।यदि जनप्रतिनिधि जनता की समस्या लेकर अधिकारियों के पास जाएं और उनकी बात लगातार टलती रहे, निर्णय फाइलों में अटक जाएं या निर्वाचित नेतृत्व की प्राथमिकताओं को प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित गंभीरता न मिले, तो इसका सीधा नुकसान जनता को होता है।
अफसरशाही मजबूत हो, लेकिन सरकार से ऊपर नहीं
किसी भी राज्य को ईमानदार, सक्षम और मजबूत नौकरशाही की आवश्यकता होती है। प्रशासन को कानून के विरुद्ध राजनीतिक दबाव स्वीकार नहीं करना चाहिए। नियमों की रक्षा करना भी अधिकारी का दायित्व है।लेकिन मजबूत नौकरशाही और हावी नौकरशाही में बड़ा अंतर है।अधिकारी सरकार को तथ्य, नियम और व्यावहारिक कठिनाइयों से अवगत कराएं, गलत निर्णयों पर स्पष्ट सलाह दें और कानून का पालन सुनिश्चित करें—यह सुशासन है। लेकिन यदि नीति की दिशा तय करने से लेकर राजनीतिक प्राथमिकताओं तक प्रशासनिक तंत्र ही निर्णायक दिखाई देने लगे, तो निर्वाचित व्यवस्था कमजोर पड़ने लगती है।
मंत्री केवल नाम के न रह जाएं…….
मंत्री किसी विभाग का केवल राजनीतिक चेहरा नहीं होता। संविधान और शासन व्यवस्था में विभाग की राजनीतिक जवाबदेही मंत्री की होती है। इसलिए विभागीय निर्णयों की जानकारी, समीक्षा और दिशा तय करने में मंत्री की प्रभावी भूमिका आवश्यक है।अगर किसी व्यवस्था में मंत्री को अपने ही विभाग की महत्वपूर्ण गतिविधियों की पूरी जानकारी समय पर न मिले, जनप्रतिनिधियों की अनुशंसाएं लगातार लंबित रहें और सारे महत्वपूर्ण निर्णय कुछ चुनिंदा अधिकारियों के इर्द-गिर्द सिमट जाएं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।जब जवाब जनता मंत्री से मांगे और निर्णय लेने की वास्तविक ताकत कहीं और केंद्रित हो जाए, तब जवाबदेही का पूरा ढांचा कमजोर होता है।
अफसर स्थायी, सरकार पांच साल की—यहीं चाहिए संतुलन
नौकरशाही की संस्थागत निरंतरता उसकी सबसे बड़ी ताकत है। सरकारें बदलती हैं, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था बनी रहती है। अनुभवी अधिकारी शासन को निरंतरता और विशेषज्ञता देते हैं।इसी कारण उनका महत्व बहुत बड़ा है।पर यही ताकत यदि प्रभाव के असंतुलन में बदल जाए तो समस्या पैदा होती है। प्रशासन को सरकार का विकल्प नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों को संवैधानिक और प्रभावी तरीके से जमीन पर उतारने वाला तंत्र बने रहना चाहिए।
कमजोर राजनीतिक नेतृत्व बढ़ाता है अफसरशाही का प्रभाव
जहां राजनीतिक नेतृत्व अपने विभाग की नियमित समीक्षा करता है, नियम-कायदों को समझता है, स्पष्ट निर्णय लेता है और परिणाम की जवाबदेही तय करता है, वहां नौकरशाही और राजनीति के बीच स्वस्थ संतुलन बना रहता है।लेकिन जहां निर्णय लेने में अनिश्चितता हो, मंत्री अधिकारियों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हों या राजनीतिक नेतृत्व प्रशासनिक मामलों में अपनी भूमिका सीमित कर ले, वहां स्वाभाविक रूप से नौकरशाही का प्रभाव बढ़ जाता है।इसलिए केवल अधिकारियों को दोषी ठहराना भी समस्या का पूरा विश्लेषण नहीं होगा। निर्वाचित नेतृत्व को अपनी संवैधानिक और राजनीतिक जिम्मेदारी स्वयं मजबूती से निभानी होगी।
जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा आखिर जनता की उपेक्षा
किसी भी सांसद या विधायक की बात का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वह सांसद और विधायक है। उसके पीछे हजारों-लाखों मतदाताओं का जनादेश होता है।जनता ने भरोसा करके उसको चुना है।इसका अर्थ यह भी नहीं कि अधिकारी जनप्रतिनिधि की हर मांग बिना नियम-कानून देखे स्वीकार करें। लेकिन जनहित से जुड़े वैध विषयों को सुनना, समयबद्ध उत्तर देना और नियमों के भीतर समाधान निकालना प्रशासनिक जवाबदेही का हिस्सा होना चाहिए।जनप्रतिनिधि और अधिकारी एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, लेकिन उद्देश्य एक होना चाहिए—जनता का हित।
‘कौन ज्यादा पावरफुल’ नहीं, ‘कौन जवाबदेह’ यह सवाल जरूरी
छत्तीसगढ़ जैसे तेजी से विकसित होते राज्य में इस बहस को व्यक्ति विशेष के आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित करने के बजाय संस्थागत दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।
सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें मंत्रियों की विभागीय समीक्षा नियमित हो, महत्वपूर्ण निर्णयों की जवाबदेही स्पष्ट हो, जनप्रतिनिधियों से प्राप्त जनहित के विषयों पर समयबद्ध कार्रवाई हो और अधिकारियों का मूल्यांकन केवल फाइलों के निपटारे से नहीं बल्कि जमीनी परिणामों से भी किया जाए।लोकतंत्र में नौकरशाही की शक्ति उसकी दक्षता, निष्पक्षता और कानून के प्रति प्रतिबद्धता में है, जबकि सरकार की शक्ति जनादेश से आती है। दोनों के बीच संतुलन बिगड़ना किसी भी राज्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। छत्तीसगढ़ में अफसरों की मनमानी चरम पर शुरू से रही है। नौकरशाहों को ऐसा लगता है कि मंत्री नेताओं को दबाकर ही रखना है।अल्प ज्ञान रखने वाले नेता हमको क्या आदेश करेंगे।
सत्ता का केंद्र सचिवालय नहीं, जनता का जनादेश होना चाहिए
अंततः सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ में मंत्री से ज्यादा ताकतवर अधिकारी क्यों है। इस पर सत्ता में बैठे राजनेताओं को मनन करने की आवश्यकता है।असली सवाल यह है कि जनता के प्रति जवाबदेह व्यवस्था कितनी ताकतवर है।यदि चुने हुए प्रतिनिधि नीति तय करें, अधिकारी नियमों के अनुसार उसे कुशलता से लागू करें और दोनों जनता के प्रति जवाबदेह रहें, तभी सुशासन संभव है। लेकिन जिस दिन निर्वाचित व्यवस्था कमजोर और प्रशासनिक तंत्र सर्वशक्तिमान दिखाई देने लगे, उस दिन लोकतंत्र के मूल संतुलन पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। छत्तीसगढ़ कैडर के एक आईएएस अमित कटारिया है जिनको सरकार ने दिल्ली से बुलाकर स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी सौंपी है।इनके आने के बाद से स्वास्थ्य विभाग की बदहाली आज भी नजर आ रही है।जब अफसर काम सही न करे तो इनको हटाना ज्यादा सही होगा।पर एक जमात के लोग आपस में अपना खेल खराब करना नहीं चाहते है।हम मजे में है तो तुम भी मजा करो। ऐसी प्रवृत्ति वाले नौकरशाहों से जनता को क्या फायदा होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
सरकार जनता चुनती है। नौकरशाही उस सरकार की प्रशासनिक रीढ़ है—उसका विकल्प नहीं।




