
बिलासपुर (छत्तीसगढ़ उजाला)। केंद्रीय जेल बिलासपुर में आजीवन कारावास की सजा काट रहे 82 वर्षीय बंदी सुखराम साहू की इलाज के दौरान मौत ने एक बार फिर जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लगातार सामने आ रही घटनाओं के बीच यह मामला जेल प्रबंधन की स्वास्थ्य व्यवस्था, बंदियों की निगरानी और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं को लेकर नई बहस छेड़ रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार सुखराम साहू की जेल में अचानक तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद उसे उपचार के लिए छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) भेजा गया। वहां चिकित्सकों ने उसे बचाने का प्रयास किया, लेकिन उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। प्रारंभिक तौर पर हृदयाघात की आशंका जताई जा रही है, जबकि वास्तविक कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट होगा।
सुखराम साहू वर्ष 1997 के हत्या के एक मामले में आरोपी था। बाद में उसे जमानत मिली थी, लेकिन वर्ष 2014 में न्यायालय द्वारा आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद से वह केंद्रीय जेल में निरुद्ध था।
हालांकि जेल अधीक्षक खोमेश मंडावी का कहना है कि बंदी को समय पर अस्पताल भेजा गया और पूरी प्रक्रिया नियमानुसार अपनाई गई, लेकिन इस घटना ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यदि बंदी की तबीयत लंबे समय से खराब थी, तो उसकी नियमित स्वास्थ्य निगरानी कितनी प्रभावी थी? क्या समय रहते समुचित उपचार उपलब्ध कराया गया? क्या जेल के भीतर चिकित्सा व्यवस्था पर्याप्त है? इन सवालों के जवाब अभी बाकी हैं।
लगातार हो रही घटनाओं से बढ़ी चिंता
सामाजिक संगठनों और नागरिकों का कहना है कि केंद्रीय जेल में बार-बार बंदियों की मौत और अन्य घटनाएं सामने आने के बावजूद व्यवस्थाओं में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा है। ऐसे में पूरे मामले की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
जेल प्रशासन का कहना है कि पंचनामा, पोस्टमार्टम और अन्य वैधानिक कार्रवाई जारी है। लेकिन जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक यह घटना जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न बनकर खड़ी रहेगी। यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।




