उजाला डेस्क:-
भारत की राजनीति विविध रंगों से सजी हुई हैं। राज्यों की राजनीति की ये सज़ावट वक़्त के साथ बदलती भी रहती हैं। पांच राज्यों के हालिया चुनाव में भी राजनीति के विविध रंग नजर आए। विविधताओं से भरी राजनीति सिर्फ राजनैतिक दलों के झंडो की विविधता के रूप में ही नहीं दिखती, यह विभिन्न राजनैतिक विचारों के रूप में भी नजर आती हैं। यह लोकतंत्र की सज़ावट हैं। पांच राज्यों के चुनावों में सबसे अधिक सुर्खियों में रहा पश्चिम बंगाल जंहा भाजपा के मजबूत संगठन ने ममता बेनर्जी के अभेद किले को भेदने में सफलता पाई। यहाँ शुभेन्दु अधिकारी के नैतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। असम में हेमंत विश्वशर्मा ने अपना जादू बरकरार रखा। केरलम में कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। पूंडूचेरी में एनडीए गठबंधन विजय रहा। किंतु इन सबसे अलग, सबसे जुदा और परिवर्तनकारी सुर्खियां तमिलनाडु ने बटोरी जंहा राजनीति के मैदान में महज दो बरस पहले निर्मित एक नए नवेले राजनितिक दल के नेता थालपति विजय ने परदे के नायक की छवि के बल पर विधानसभा चुनाव में सफलता प्राप्त कर 60 सालो से भी अधिक समय से राजनीति कर रहे स्थापित दलों को धुल चटाई। थलापति विजय का 10 मई 2026 को चैन्नई के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में तमिलनाडु राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करना एक फ़िल्मी अभिनेता का असल राजनीति में महज नेता बन जाने की कहानी भर नहीं, यह राज्य के मुखिया याने मुख्यमंत्री के पद पर काबिज होने की सफलतम कहानी हैं। यह कहानी भी फ़िल्म जैसी हैं। किंतु सच ये हैं की यह फ़िल्मी नहीं असल कहानी हैं। सिनेमाई किरदार को लेखक लिखता भी गढ़ता भी इसमें थोड़ी असली कहानी के साथ कल्पनाशीलता होती हैं। परदे का यह नायक बेईमानी के खिलाफ लडता हैं। गुंडों, बलात्कारियों, शराब तस्करों का भंडाफोड़ करता हैं। जनता के लिए लड़कर दर्शकों को ईमानदारी और नैतिकता का पाठ पढ़ाता हैं। जीवन की वास्तविकताओं से बिल्कुल अलग फ़िल्मी कहानी को महज तीन घंटे में प्रदर्शित करना होता हैं। हिंदी सिनेमा की नायक फ़िल्म में एक दिन का मुख्यमंत्री राज्य की बेहतरी के लिए फटाफट त्वरित निर्णय लेकर स्थापित मुख्यमंत्री की चुनौती को स्वीकार करता हैं। अपने कार्य से जन समस्या का त्वरित निराकरण फ़िल्म में ही सम्भव हैं। असल राजनीति में यह सम्भव नहीं हैं। इस फ़िल्म में नायक अनिल कपूर के अभिनय की तारीफ हुई थी। फ़िल्म ने उनकी छवि को निखारा भी था।
तमिलनाडु राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण करने वाले थालपति विजय के सामने अब फ़िल्मी नायक की छवि को बरकरार रखने का बड़ा सवाल खड़ा हुआ हैं। वह इसलिए की राज्य की असल राजनीति अनेकों बुराइयों से घिरी हुई होती हैं। असल में मुख्यमंत्री सम्पूर्ण राज्य का होता हैं। किंतु वह अपनी पार्टी के विधायक दल का नेता होता हैं। इस कारण अपनी राजनैतिक पार्टी के संरक्षण का जिम्मा भी उसी का होता हैं। एक मुख्यमंत्री जब विकास राशि का वितरण कर रहा होता हैं तब उसे अपनी पार्टी के विधायकों का अधिक ध्यान रखता होता हैं। अभी जैसे एक राजनैतिक जुमला डबल इंजिन की सरकार के रूप में प्रचलित हैं। इस राजनैतिक जुमले का अर्थ ही यही हुआ की केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होगी तभी विकास तेजी से होगा।
राजनैतिक दल जनता के द्वारा दी गयी धनराशि से नहीं चलाया जा सकता हैं। यह बड़े-बड़े उद्योगपतियों के दिए मोटे चंदे से चलता हैं। यह ओद्योगिक घराने चंदा देकर व्यवसायिक लाभ कमाने में माहिर होते हैं। फ़िल्मी नायक तो फ़िल्म में इस व्यवस्था का विरोधी होता हैं। किंतु थालपति विजय इन बुराइयों का असल मुख्यमंत्री रहते कैसे सामने कर पाते हैं, यह देखने वाली बात होगी। राजनीति में व्याप्त भाई भतीजा वाद से निपटना विजय के लिए खासा मशक्क़त भरा हो सकता हैं। ऐसा नहीं हैं की थालपति विजय के पूर्व तमिलनाड़ु में कोई फ़िल्मी अभिनेता मुख्यमंत्री नहीं बना हो। एमजी रामचंद्रन वर्ष 1977 से 1987 तक 10 बरस तमिलनाडु के सीएम रहे हैं। जयललिता एक लोकप्रिय अभिनेत्री रही जो मुख्यमंत्री बनी, एम करुणानिधि तमिल फिल्मो के पटकथा लेखक से राजनेता बने तमीलनाड़ु राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। किंतु इन तीनो को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने में लम्बा समय लगा, जबकि विजय को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचने के लिए महज दो साल का सघर्ष करना पढ़ा इस लिहाज से तमिलनाडु की जनता ने थालपति विजय को कम समय में ही मुखिया की कुर्सी पर बैठा दिया।
अब सवाल यह उठता हैं की फ़िल्म में नायक का किरदार निभाने वाले सुपर स्टार असल जीवन की काँटों भरी राजनीति में तमिलनाड़ु राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में उसी तरह जनता के प्रिय बने रहेंगे, जैसे फ़िल्म के नायक के रूप में उनकी छवि जनता के मन में अंकित हैं। फ़िल्म में गरीबो का मसीहा, ईमानदार अफसर, सिद्धांत वादी नेता, माफियाओ का दुश्मन मुख्यमंत्री के रूप इन भूमिकाओ का निर्वहन कर पाएगा। जबकि मुख्यमंत्री के रूप में अन्याय और भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू की गयी मुहीम उन्हें जनता का असली नायक बना सकती हैं। टीवीके पार्टी के नेता के रूप में उन्होंने जनता से समाजिक न्याय और सच्चे धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना का वादा भी किया हैं।
तमिलनाड़ु राज्य के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें गठबंधन के साथियों के साथ अपने घोषणा-पत्र में किये वायदो को भी पूरा करना हैं। महिलाओं को 2500 रु मासिक सहायता, स्नातको के लिए 4000 रु बेरोजगारी सहायता और मुफ्त एलपीजी सिलेंडर जैसे लोक लुभावन वादे भी पुरे करना हैं। तब क्या यह माना जाए की जनता घोषणाओं के आकर्षण पर मतदान करती हैं। तमिलनाडु राज्य के चुनाव में नायक की छवि और घोषणाओं ने मिलकर कम समय में चुनाव में सफलता प्राप्त की हैं। आने वाले समय में यह सवाल कायम रहेगा की क्या नायक की छवि से न्याय कर पाए मुख्यमंत्री थालपति विजय।राजनीति के विविध रंगों में दक्षिण के रंग भी असरकारी हैं। जिस प्रकार से फ़िल्मी नायको, नायिकाओं के प्रति आस्था यहाँ बताई जाती हैं वह काबिलेगौर हैं। फ़िल्मी कलाकारों को ईश्वर की तरह पूजने और उनके मंदिर बनाए जाने की दक्षिण राज्यों की संस्कृति और परम्परा हैं। अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के प्रति तमिलनाड़ु राज्य की जनता का प्रेम आस्था और विश्वास हैं। यह कला का सम्मान भी हैं। इसी जनता ने एमजी रामचंद्रन, जे जयललिता को भी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया था। पटकथा लेखक एम करुणानिधि भी इसी क्रम में शामिल हैं। अब थालपति विजय भी सिनेमाई नायक से राज्य के मुख्यमंत्री बने हैं। उम्मीद करनी चाहिए विजय की यह यात्रा सफलता के सोपान चढ़ेगी। तमिलनाड़ु राज्य का यह जननायक तमाम राजनैतिक मजबूरियों के बावजूद अपने नायक को जिन्दा रख पाएँगा।
————–

नरेंद्र तिवारी स्वतंत्र लेखक
मोतिबाग सेंधवा जिला बड़वानी मप्र।




