गौरेला पेंड्रा मरवाहीछत्तीसगढ

“आखिर किसे फायदा पहुंचाने की कोशिश? बिना डायवर्शन जमीन और भारी आपत्तियों के बावजूद मरवाही में शराब दुकान शिफ्टिंग को मंजूरी”

“आबादी और स्कूल के बीच चयन, शासकीय कर्मचारी की जमीन और निविदा प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल”

मरवाही (छत्तीसगढ़ उजाला)
नगर पंचायत मरवाही में प्रस्तावित शासकीय शराब दुकान की शिफ्टिंग अब एक गंभीर प्रशासनिक विवाद बन चुकी है। लगातार सामने आ रहे आरोपों और तथ्यों ने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया है। अब यह मामला सिर्फ स्थान परिवर्तन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नियमों की अनदेखी, चयन प्रक्रिया में पक्षपात और संभावित मिलीभगत जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ गया है।
आबादी के बीच, स्कूल के पास—फिर भी चयन क्यों?
आरोप है कि जिस भूमि को शराब दुकान के लिए प्रस्तावित किया गया है, वह शहर के बेहद नजदीक और घनी आबादी वाले क्षेत्र में स्थित है। इतना ही नहीं, उस स्थल के आसपास स्कूल और रिहायशी इलाके भी मौजूद हैं।
इसको लेकर स्थानीय ग्रामीणों और नागरिकों ने पहले ही आपत्ति दर्ज कराई थी।
ग्रामीणों का कहना है कि ऐसे संवेदनशील इलाके में शराब दुकान का संचालन सामाजिक और सुरक्षा दोनों दृष्टिकोण से अनुचित है। बच्चों और युवाओं पर इसके नकारात्मक प्रभाव को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं। इसके बावजूद उसी स्थान को प्राथमिकता दिया जाना कई सवाल खड़े करता है।
बिना डायवर्शन मंजूरी—नियमों की खुली अनदेखी?
सबसे बड़ा और गंभीर आरोप यह है कि चयनित जमीन (खसरा नंबर 12/1) का अब तक भूमि उपयोग परिवर्तन (डायवर्शन) नहीं हुआ है। यानी जमीन अभी भी कृषि श्रेणी में दर्ज है और उसे व्यावसायिक उपयोग के लिए वैधानिक रूप से परिवर्तित नहीं किया गया है।
नियमों के अनुसार किसी भी व्यावसायिक गतिविधि के लिए भूमि का डायवर्शन अनिवार्य होता है। ऐसे में बिना डायवर्शन के शराब दुकान के लिए भवन चयन और प्रस्ताव पारित किया जाना सीधे-सीधे नियमों की अवहेलना माना जा रहा है।
ग्रामीणों और आवेदनकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि जब आम लोगों के आवेदन सिर्फ “डायवर्शन नहीं” होने के आधार पर निरस्त कर दिए जाते हैं, तो इस मामले में यह छूट क्यों दी गई? क्या नियम सिर्फ आम जनता के लिए ही हैं?
शासकीय कर्मचारी की जमीन को फायदा?
मामले में यह भी आरोप सामने आया है कि चयनित भूमि के मालिक सतीश तिवारी एक शासकीय कर्मचारी हैं। ऐसे में उनकी भूमि को प्रस्तावित किया जाना और पात्र सूची में शामिल करना कई कानूनी और नैतिक सवाल खड़े करता है।
सिविल सेवा आचरण नियमों के तहत शासकीय कर्मचारियों को निजी लाभ से जुड़े मामलों में भागीदारी से रोका जाता है या कड़ी शर्तों के अधीन रखा जाता है। ऐसे में यह जांच का विषय बनता है कि क्या इस प्रक्रिया में इन नियमों का उल्लंघन हुआ है।
निविदा प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
पूरे प्रकरण में निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आवेदनकर्ताओं का आरोप है कि प्रक्रिया को निष्पक्ष तरीके से नहीं अपनाया गया, बल्कि एक विशेष व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को दरकिनार किया गया।
जिला स्तरीय चयन समिति की भूमिका भी अब जांच के घेरे में है। क्या समिति ने जमीन की वैधानिक स्थिति, डायवर्शन और स्थानीय आपत्तियों की सही जांच की थी? यदि हां, तो मंजूरी कैसे दी गई? और यदि नहीं, तो यह गंभीर लापरवाही मानी जाएगी।
प्रशासन की साख दांव पर, जांच की मांग तेज
पूरा मामला अब प्रशासनिक साख पर सीधा सवाल बन गया है। एक ओर नियमों की अनदेखी के आरोप हैं, तो दूसरी ओर पक्षपात और संभावित संरक्षण की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।
जनता पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रही है।
आवेदनकर्ताओं ने कलेक्टर को दिए ज्ञापन में स्पष्ट रूप से निष्पक्ष जांच की मांग की है, ताकि यह सामने आ सके कि आखिर किन परिस्थितियों में बिना डायवर्शन, जनविरोध और संवेदनशील लोकेशन के बावजूद इस भूमि को प्रस्तावित किया गया।
अब सबसे बड़ा सवाल…
क्या बिना डायवर्शन जमीन पर शराब दुकान की मंजूरी देना वैध है?
क्या शासकीय कर्मचारी की भूमि को इस तरह प्रस्तावित करना नियमों का उल्लंघन नहीं?
क्या जिला स्तरीय समिति ने अपने दायित्वों का सही निर्वहन किया?
और सबसे अहम—क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या मामला दबा दिया जाएगा?

प्रशांत गौतम

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