
रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)
छत्तीसगढ़ विधानसभा में संस्कृति विभाग के कामकाज को लेकर उस समय जोरदार हंगामा मच गया, जब भाजपा विधायक Ajay Chandrakar ने सदन और राजपत्र में गलत जानकारी दिए जाने का आरोप लगाया। चंद्राकर ने तीखी नाराजगी जताते हुए कहा कि आखिर संस्कृति विभाग के अधिकारियों की इतनी हिमाकत कैसे हो गई कि वे सदन को ही गुमराह करने लगे।
उन्होंने संस्कृति मंत्री Rajesh Agrawal से सीधे कहा कि “आप इन अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं कर पाएंगे, क्योंकि इनके हाथ बहुत लंबे हैं।” चंद्राकर के इस बयान से सदन में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया।
सवालों से मंत्री को घेरा
दरअसल शुक्रवार को छत्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति और कला से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए अजय चंद्राकर ने एक के बाद एक कई सवाल दागे। उन्होंने संस्कृति मंत्री को घेरते हुए पूछा कि छत्तीसगढ़ संस्कृति परिषद के अधीन आने वाली 9 संस्थाओं ने पिछले 6 वर्षों में आखिर क्या काम किया है।
चंद्राकर ने परिषद के अंतर्गत आने वाली अकादमियों और शोधपीठों के कामकाज पर भी सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि पदुम पुन्नालाल बख्शी शोधपीठ, श्रीकांत शोधपीठ और साहित्य अकादमी ने अब तक क्या ठोस काम किया है और वहां किस तरह की नियुक्तियां हुई हैं।
“भाषा और संस्कृति के नाम पर सिर्फ आयोजन”
विधायक चंद्राकर ने आरोप लगाया कि प्रदेश में भाषा और संस्कृति के नाम पर सिर्फ जयंती समारोह, संगोष्ठियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहे हैं। करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, लेकिन ठोस काम कहीं नजर नहीं आ रहा।
उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृति परिषद की सभी संस्थाओं को अलग-अलग कर देना चाहिए या फिर परिषद को ही बंद कर देना चाहिए, क्योंकि इसकी मूल भावना के अनुरूप काम नहीं हो रहा है।
राजपत्र में भाषा को लेकर गड़बड़ी पर सवाल
चंद्राकर ने फिल्म विकास निगम के राजपत्र में “छत्तीसगढ़ भाषा” लिखे जाने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने मंत्री से पूछा कि आखिर यह क्या है—छत्तीसगढ़ी भाषा या छत्तीसगढ़ भाषा?
इस पर मंत्री राजेश अग्रवाल ने जवाब देते हुए कहा कि इस मामले का परीक्षण कराया जाएगा और जरूरत पड़ी तो कार्रवाई भी की जाएगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि “छत्तीसगढ़ी भाषा नहीं है”, जिस पर भी सदन में चर्चा तेज हो गई।
छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग
चंद्राकर ने छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए और पूछा कि आयोग अब तक क्या ठोस काम कर पाया है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ी का व्याकरण हिंदी से भी पुराना है और इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए ठोस पहल होनी चाहिए।
उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र कुरूद में एमपी थिएटर निर्माण में कथित गड़बड़ी और प्रदेश में अब तक अभिलेखागार नहीं बनने का मुद्दा भी उठाया।
“एक ही अधिकारी चला रहा पूरा विभाग”
चंद्राकर ने यह भी आरोप लगाया कि संस्कृति विभाग को व्यावहारिक रूप से एक ही अधिकारी चला रहे हैं। इसी दौरान विभाग के संचालक Vivek Acharya को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई।
सूत्रों के मुताबिक वन सेवा के अधिकारी विवेक आचार्य लंबे समय से संस्कृति और पर्यटन विभाग में पदस्थ हैं और उन पर विभाग में मनमानी और अनियमितता के आरोप भी लगते रहे हैं।
सत्ता बदलने के बाद भी बरकरार प्रभाव?
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि कांग्रेस शासन के दौरान भी उनकी पकड़ मजबूत थी। उस समय राज्य में Bhupesh Baghel के नेतृत्व में सरकार थी और विभाग में उनकी भूमिका काफी प्रभावशाली मानी जाती थी।
वहीं भाजपा सरकार आने के बाद भी यह अधिकारी लगातार उसी विभाग में बने हुए हैं। सूत्रों का दावा है कि संगठन और केंद्र स्तर तक पहुंच का हवाला देकर वे विभाग में अपनी स्थिति बनाए हुए हैं।
सरकार की साख पर सवाल
विधानसभा में मामला उठने के बाद अब यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी गरमाता जा रहा है। जानकारों का कहना है कि यदि शिकायतों और आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो इससे सरकार के सुशासन के दावों पर भी सवाल उठ सकते हैं।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि विधानसभा में उठे इस मामले के बाद सरकार संस्कृति विभाग की कार्यप्रणाली और आरोपों को लेकर क्या कदम उठाती है।



