गौरेला पेंड्रा मरवाहीछत्तीसगढ

मुख्यमंत्री बोले – “भ्रष्टाचार बख्शा नहीं जाएगा”…फिर मुनारा मॉडल के निर्माण कार्यों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं?

गौरेला–पेण्ड्रा–मरवाही (छत्तीसगढ़ उजाला)
जिले के छठवें स्थापना दिवस पर आयोजित अरपा महोत्सव के मंच से मुख्यमंत्री ने दो टूक कहा — “भ्रष्टाचार को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।”
लेकिन इसी जिले के मरवाही वनमंडल में कैम्पा मद से स्वीकृत करोड़ों रुपये के निर्माण कार्यों को लेकर उठ रहे सवाल अब प्रशासनिक प्रतिबद्धता की परीक्षा लेते नजर आ रहे हैं।
कैम्पा मद से करोड़ों की स्वीकृति — जमीनी हकीकत पर सवाल
वित्तीय वर्ष 2024–25 में मुनारा (वॉच टावर), रेंज ऑफिस भवन, डिपो आवास और ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए करोड़ों रुपये की स्वीकृति दी गई। विभागीय रिकॉर्ड में कार्य प्रगति पर बताए जा रहे हैं।
हालांकि स्थानीय कर्मचारियों और ग्रामीणों का आरोप है कि—
कई मुनारे अधूरे या निम्न गुणवत्ता के हैं
सड़क निर्माण मानकों के अनुरूप नहीं
आवास निर्माण में तकनीकी खामियां हैं
भुगतान प्रक्रिया तेज है, जबकि निगरानी कमजोर बताई जा रही है
एक स्थानीय कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “कागज़ों में काम मजबूत दिखता है, लेकिन जमीन पर कई जगह अधूरापन साफ नजर आता है।”
इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
जुगलबंदी के आरोप — निर्णय प्रक्रिया पर सवाल
वनमंडल के भीतर यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि एक सप्लायर और रेंजर स्तर के अधिकारी के बीच करीबी तालमेल के चलते फाइलों की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि—किसका बिल पास होगा,भुगतान किसे और कब मिलेगा!कौन-सा कार्य प्राथमिकता में रहेगा
इन निर्णयों पर अनौपचारिक प्रभाव की भूमिका है।
हालांकि संबंधित पक्षों की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
पोस्टिंग और प्रक्रिया पर उठते सवाल
रेंजर की पोस्टिंग उस समय हुई जब वरिष्ठ अधिकारी सेवानिवृत्ति के करीब थे। अब स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि—
क्या पोस्टिंग पूरी तरह नियमानुसार प्रक्रिया से हुई?
क्या किसी विशेष अनुशंसा की भूमिका रही?
इन सवालों का कोई आधिकारिक उत्तर अभी सामने नहीं आया है, लेकिन विभागीय हलकों में चर्चा तेज है।
जातिगत समर्थन और पैरवी की चर्चा
जैसे-जैसे निर्माण कार्यों पर सवाल उठे, मामला कथित रूप से सामाजिक और जातिगत समर्थन की दिशा में मुड़ता दिखाई दिया। कुछ लोगों का आरोप है कि विवाद को अलग दिशा देने की कोशिश की गई।
रेंजर स्तर से सफाई दी गई है कि संबंधित व्यक्ति केवल सप्लायर है और निर्णय प्रक्रिया विभागीय नियमों के तहत होती है।
हालांकि विभाग के कुछ कर्मचारियों का कहना है कि सप्लाई के नाम पर प्रभाव की चर्चा पहले से चल रही थी। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
वरिष्ठ कार्यालयों तक सीधी पहुंच?
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि संबंधित सप्लायर की वरिष्ठ अधिकारियों के कार्यालयों में निर्बाध पहुंच है। यदि ऐसा है, तो पारदर्शिता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि इस संबंध में भी कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है।
वित्तीय ऑडिट और FIR की मांग तेज
स्थानीय संगठन, कुछ कर्मचारी और जागरूक नागरिक अब मांग कर रहे हैं कि—स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए,संपूर्ण वित्तीय ऑडिट कराया जाए,विभागीय जिम्मेदारी तय की जाए
और अनियमितता सिद्ध होने पर FIR दर्ज की जाए
उनका कहना है कि यदि सब कुछ नियमों के तहत हुआ है, तो जांच से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।
सबसे बड़ा सवाल — जांच कब?
जब मुख्यमंत्री स्वयं सार्वजनिक मंच से यह स्पष्ट कर चुके हैं कि “भ्रष्टाचार बख्शा नहीं जाएगा”, तो अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मरवाही वनमंडल के इन निर्माण कार्यों पर क्या औपचारिक जांच बैठाई जाएगी?
क्या आरोपों की पारदर्शी जांच होगी, या मामला चर्चाओं तक सीमित रह जाएगा — यही सवाल अब जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है।

प्रशांत गौतम

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