भ्रष्टाचार बख्शा नहीं जाएगा:तो फिर वनमंडल मरवाही में चुप्पी क्यों?
100 करोड़ की सौगात, मगर कार्रवाई शून्य! मुनारा से मॉडल रेंज तक घोटाले के आरोपों पर अब तक FIR क्यों नहीं?”

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही (छत्तीसगढ़ उजाला)
नवगठित जीपीएम जिले को हाल ही में 100 करोड़ रुपये से अधिक के विकास कार्यों की सौगात मिली है। अरपा महोत्सव के मंच से मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने दो टूक कहा था— “भ्रष्टाचार को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।”
लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि वनमंडल मरवाही में करोड़ों रुपये के निर्माण कार्यों को लेकर उठ रहे आरोपों पर अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं दिख रही?
कैम्पा मद के करोड़ों, जमीनी हकीकत पर सवाल
वर्ष 2024–25 में कैम्पा मद से मुनारा निर्माण, मॉडल रेंज कार्यालय, डिपो आवास और ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए करोड़ों रुपये स्वीकृत किए गए। उद्देश्य था—वन क्षेत्रों में आधारभूत संरचना को मजबूत करना और प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना।
हालांकि स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि कागजों में जिन कार्यों को पूर्ण और गुणवत्तापूर्ण बताया गया है, वे जमीन पर अधूरे या निम्न गुणवत्ता के नजर आ रहे हैं। कुछ कर्मचारियों और ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण की गुणवत्ता और भुगतान प्रक्रिया दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अब तक विभागीय स्तर पर इन आरोपों पर कोई विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
जुगलबंदी की चर्चा, आधिकारिक पुष्टि नहीं
स्थानीय चर्चाओं में एक प्रभावशाली सप्लायर और एक रेंज अधिकारी का नाम बार-बार लिया जा रहा है। आरोप यह लगाए जा रहे हैं कि फाइलों की प्रक्रिया और भुगतान में बाहरी प्रभाव की भूमिका हो सकती है।
हालांकि इन आरोपों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन विभागीय हलकों में यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है। ऐसे में पारदर्शिता और स्पष्टता की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
तकनीकी जांच बनाम सामाजिक बहस
जैसे ही निर्माण कार्यों में अनियमितता की चर्चा तेज हुई, बहस का रुख गुणवत्ता से हटकर सामाजिक और जातिगत समीकरणों की ओर मुड़ता दिखाई दिया। जानकारों का कहना है कि यदि कोई तकनीकी या वित्तीय अनियमितता है, तो उसकी जांच पेशेवर और निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए।
यह भी स्पष्ट है कि आरोप लगना और दोष सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं। इसलिए सच्चाई सामने लाने के लिए पारदर्शी जांच ही एकमात्र रास्ता है।
डीएफओ कार्यालय की भूमिका पर भी प्रश्न
स्थानीय स्तर पर यह भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या सप्लायरों की विभागीय पहुंच सामान्य से अधिक प्रभावशाली है?
क्या सभी निर्णय नियमानुसार और पारदर्शिता से लिए गए?
क्या कार्यों का स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन कराया गया?
ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका सार्वजनिक उत्तर आना जरूरी माना जा रहा है।
वित्तीय ऑडिट और FIR की मांग
स्थानीय संगठनों, कुछ कर्मचारियों और जागरूक नागरिकों ने पूरे मामले में—
स्वतंत्र वित्तीय ऑडिट
तकनीकी गुणवत्ता जांच
विभागीय कार्रवाई
और आवश्यकता पड़ने पर FIR दर्ज करने
की मांग की है। उनका तर्क है कि यदि सभी कार्य नियमों के अनुरूप हुए हैं, तो जांच से परहेज क्यों?
मुख्यमंत्री का बयान बनाम जमीनी सवाल
मुख्यमंत्री ने जीपीएम जिले को विकास की नई दिशा देने का भरोसा दिलाया है। ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि—
100 करोड़ की विकास राशि की निगरानी किस स्तर पर हो रही है?
आरोपों की निष्पक्ष जांच कब शुरू होगी?
पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे?
जब सरकार भ्रष्टाचार के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात कर रही है, तब वनमंडल मरवाही के मामले में स्पष्टता और कार्रवाई की अपेक्षा स्वाभाविक है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि प्रशासन इन सवालों का जवाब किस रूप में देता है।



