षडयंत्रों पर विष्णुदेव का धैर्य भारी…..देवेंद्र गुप्ता की कलम से……

षडयंत्रों पर विष्णुदेव का धैर्य भारी है!🌷
रायपुर/छत्तीसगढ़ में आज एक अजीब किस्म की राजनीति चल रही है जहां हर गलती का ठीकरा सीधे मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के सिर पर फोड़ दिया जाता है, लेकिन जिनके विभाग में गड़बड़ी होती है, वे मंत्री और अफसर ऐसे बच निकलते हैं जैसे उनकी कोई जिम्मेदारी ही नहीं। जनता भी देख रही है और सिस्टम भी जानता है कि मुख्यमंत्री पूरे राज्य के मुखिया हैं, पर हर जिले, हर गोदाम, हर कार्यालय और हर विभाग की दिन-रात निगरानी अकेले मुख्यमंत्री कैसे कर सकते हैं? यदि कवर्धा और महासमुंद में चूहों द्वारा धान खाने जैसी गंभीर शिकायतें सामने आती हैं, तो सवाल मुख्यमंत्री से पहले विभागीय मंत्री से पूछा जाना चाहिए, जिला प्रशासन से जवाब तलब होना चाहिए, और जिम्मेदार अफसरों की कुर्सी हिलनी चाहिए। लेकिन यहां तो खेल उल्टा है गलती नीचे होती है, लेकिन निशाना ऊपर लगाया जाता है। यह शासन व्यवस्था नहीं, जिम्मेदारी से भागने की सबसे सुविधाजनक चाल है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को टारगेट पर लेने वालों को यह समझना चाहिए कि वे किसी ऐसे नेता पर उंगली उठा रहे हैं, जिसका सबसे बड़ा “गुनाह” उसकी सिधाई और संयम है। आज के दौर में जब राजनीति में ज्यादातर लोग कैमरों के सामने गरजना, धमकाना और बयानबाज़ी को ही नेतृत्व समझ बैठे हैं, वहां विष्णुदेव साय शांति से काम करने वाले मुख्यमंत्री हैं। वे चीखते नहीं, वे दिखाते नहीं, वे प्रचार में नहीं जीते वे काम की भाषा समझते हैं। लेकिन यही सादगी आज कुछ लोगों को चुभती है, क्योंकि शोर मचाकर सुर्खियां बटोरने वाले माहौल में एक शांत आदमी सबसे बड़ा “खतरा” बन जाता है।
असल मुद्दा यह है कि मुख्यमंत्री को कई बार मंत्रिमंडल का वैसा सहयोग नहीं मिल पाता जैसा एक मजबूत सरकार में मिलना चाहिए। कुछ विभागों में लापरवाही होती है, कहीं ढिलाई होती है, कहीं अफसरशाही की मनमानी चलती है, और जब मामला बिगड़ जाता है तो राजनीतिक बचाव का सबसे आसान तरीका यही निकाल लिया जाता है कि मुख्यमंत्री को कटघरे में खड़ा कर दो। सवाल यह है कि विभागीय मंत्री किस लिए बने हैं? क्या केवल गाड़ी, बंगला, बोर्ड और फोटो खिंचवाने के लिए? अगर किसी विभाग में लगातार शिकायतें आ रही हैं, तो मंत्री का धर्म है कि वह अपने विभाग की नकेल कसे, अफसरों को लाइन पर लाए, और परिणाम दे। लेकिन जब मंत्री खुद “आराम मोड” में हों, तो फिर मुख्यमंत्री की छवि को ढाल बनाकर बचने की कोशिश की जाती है।
और इससे भी बड़ी बात यह है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने लंबे समय तक संगठन के अनावश्यक हस्तक्षेप को भी धैर्य के साथ सहा है। समकक्ष सरकार चलाने के प्रयत्नों को नजर अंदाज किया। आज हर कोई जानता है कि सरकार चलाना एक जिम्मेदारी है, लेकिन जब शासन के ऊपर शासन चलाने की कोशिशें होती हैं, तब मुख्यमंत्री की राह आसान नहीं रहती।
इसके बावजूद उन्होंने कभी सार्वजनिक मंच पर शिकायत नहीं की, कभी किसी के खिलाफ बयान नहीं दिया, कभी भीतर की बातें बाहर नहीं कीं। यही उनकी सिधाई है, यही उनकी मर्यादा है और यही उनकी राजनीतिक परिपक्वता भी। आज अगर कोई पूछे कि विष्णुदेव साय की सिधाई का सबसे बड़ा प्रमाण क्या है, तो जवाब साफ है इतनी राजनीति, इतना दबाव, इतनी अंदरूनी खींचतान झेलने के बावजूद उन्होंने एक शब्द भी उछालकर प्रदेश की व्यवस्था को अस्थिर नहीं होने दिया।
मुख्यमंत्री के खिलाफ षड्यंत्र भी हुए, यह बात नई नहीं है। कभी अफवाहों के जरिए, कभी अंदरखाने चालों के जरिए, कभी प्रशासन की विफलताओं का दोष मढ़कर, तो कभी मंत्रियों-अफसरों की लापरवाही को “मुख्यमंत्री की नाकामी” बताकर। हद तो तब हो गई जब उनका और भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन का फर्जी वीडियो वायरल किया गया। और जब दिल्ली के निर्देश पर पुलिसिया कार्रवाई हुई तो सब की आंखें फटी की फटी रह गई। कार्रवाई सीमित ही रही पर इसने कई बड़े चेहरों को बेनकाब कर दिया। इसके बावजूद विष्णुदेव साय हमेशा की तरह शांत रहे विचलित नहीं हुए।

यह वही नेतृत्व है जो बदले की राजनीति नहीं करता, बल्कि भरोसे की राजनीति करता है। और यही बात उन लोगों को सबसे ज्यादा परेशान करती है, जो सत्ता में रहकर भी सत्ता का इस्तेमाल केवल शोर और दबाव बनाने में करते हैं।
सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि विष्णुदेव साय एक सीधा-साधा आदिवासी नेता हैं, जो जमीन से उठकर यहां तक पहुंचे हैं। उनकी पहचान बनावटी नहीं है, उनके चेहरे पर चमक सत्ता की नहीं है। वे राजनीतिक चमक-दमक के नेता नहीं, बल्कि सहज स्वभाव और शांत नेतृत्व के प्रतीक हैं। लेकिन आज के दौर में सरल आदमी को कमजोर समझ लिया जाता है और सिधाई को मजबूरी।
प्रदेश में कुछ अच्छा भी हुआ है जिसका श्रेय सीधे मुख्यमंत्री को ही जाता है। क्योंकि बड़े कामों की दिशा मुख्यमंत्री तय करता है। फैसलों का विजन मुख्यमंत्री तय करता है। जनता के लिए प्राथमिकता कौन-सी होगी, यह मुख्यमंत्री तय करता है। मगर जब सिस्टम में बैठे कुछ लोग अपनी जिम्मेदारी से भागते हैं, तो अच्छे फैसलों की चमक भी धुंधली हो जाती है और व्यक्तिगत तौर पर श्रेय लूटने का प्रयत्न शुरू हो जाता है।उसके बाद फिर राजनीति का वही पुराना खेल शुरू हो जाता है काम पर चर्चा नहीं होती, व्यक्ति पर हमला होता है। सवाल ये नहीं कि मुख्यमंत्री पर आरोप लगाओ, सवाल यह है कि जिन विभागों में गड़बड़ी हो रही है, वहां की जवाबदेही तय करो। दोषी अफसरों पर कार्रवाई करो। मंत्री से जवाब मांगो। नहीं तो यह समझ लीजिए कि छत्तीसगढ़ में व्यवस्था सुधारने की जगह केवल “मुख्यमंत्री को फंसाने” का खेल खेला जा रहा है।
विष्णुदेव साय के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की जटिलता, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, बेरोज़गारी की मार, व्यवस्थागत लापरवाही और अफसरशाही की जड़ता, सब कुछ एक साथ है। ऊपर से राजनीति भी है, भीतर की खींचतान भी है, संगठन का दबाव भी है। लेकिन इसके बावजूद मुख्यमंत्री धैर्य के साथ सरकार चला रहे हैं। यही उनकी ताकत है। यही उनके नेतृत्व की असली परीक्षा है और यही उनकी जीत भी।
आज छत्तीसगढ़ को ऐसे मुख्यमंत्री की जरूरत है जो प्रदर्शन नहीं, परिणाम दे। जो बदले की भाषा नहीं, विकास की भाषा बोले। जो गुस्से से नहीं, संयम से काम ले। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय उसी श्रेणी के नेता हैं। लेकिन अगर सिस्टम के अंदर बैठे लोग अपने विभाग को संभालने की बजाय मुख्यमंत्री की छवि पर बोझ डालते रहे, तो नुकसान सरकार का नहीं, प्रदेश का होगा। क्योंकि मुख्यमंत्री कमजोर नहीं हो रहे—मुख्यमंत्री को कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं। और जनता अब समझने लगी है कि असली सवाल मुख्यमंत्री का नहीं, बल्कि सिस्टम में बैठे उन लोगों का है जो जवाबदेही से भागकर मुख्यमंत्री को ढाल बना रहे हैं।




